सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के एक पुराने रीडेवलपमेंट विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आर्बिट्रेशन अवॉर्ड में संशोधन किया है। कोर्ट ने कहा कि संपत्ति मालिकों को निर्माण में देरी के लिए सीमित मुआवजा मिलना चाहिए, क्योंकि यह शर्त खुद समझौते में तय थी।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जिन हिस्सों को पहले चुनौती नहीं दी गई, उन्हें दोबारा नहीं खोला जा सकता।
क्या था मामला?
यह विवाद साल 2010 के एक रीडेवलपमेंट एग्रीमेंट से जुड़ा था। समझौते के तहत भायना परिवार ने अपनी पुरानी बिल्डिंग को दोबारा बनाने का काम बिल्डर विनोद सेठ को दिया था। बदले में बिल्डर को दूसरी मंजिल रखने का अधिकार और मालिकों को ₹64 लाख देने थे।
एग्रीमेंट में यह भी तय था कि तय समय के बाद निर्माण में देरी होने पर बिल्डर को प्रतिदिन ₹10,000 पेनल्टी देनी होगी।
लेकिन 2011 में निर्माण कार्य बीच में ही रुक गया। इसके बाद मालिकों ने समझौता समाप्त कर दिया और मामला आर्बिट्रेशन तक पहुंच गया।
आर्बिट्रेटर ने शुरुआत में मालिकों को हर्जाना दिया था, लेकिन बाद में दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने यह कहते हुए मुआवजा खत्म कर दिया कि मालिक यह साबित नहीं कर सके कि उन्हें वास्तविक नुकसान हुआ था।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की इस सोच से असहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि जब समझौते में खुद देरी पर प्रतिदिन पेनल्टी तय थी, तब अलग से नुकसान साबित करना जरूरी नहीं था।
बेंच ने कहा,
“समझौते की शर्तों से यह स्पष्ट था कि देरी होने पर मालिकों को नुकसान माना जाएगा।”
हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि मालिक केवल उस अवधि के लिए ही पेनल्टी मांग सकते हैं, जब तक समझौता प्रभावी था। रिकॉर्ड के अनुसार यह अवधि 9 सितंबर 2011 से 11 नवंबर 2011 तक की थी।
कोर्ट ने 63 दिनों की देरी के हिसाब से मालिकों को ₹6.3 लाख देने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आर्बिट्रेशन अवॉर्ड में कई कानूनी त्रुटियां थीं। इसके बावजूद कोर्ट ने पूरा अवॉर्ड रद्द नहीं किया क्योंकि पक्षकार 2012 से मुकदमेबाजी में उलझे हुए थे।
कोर्ट ने गायत्री बालासामी बनाम ISG नोवासॉफ्ट टेक्नोलॉजीज लिमिटेड फैसले का हवाला देते हुए कहा कि लंबे समय से लंबित विवादों में न्याय के हित में अवॉर्ड में सीमित संशोधन किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिल्डर पक्ष ₹81.92 लाख पाने का हकदार है, जबकि मालिकों को ₹6.3 लाख पेनल्टी मिलेगी। दोनों रकम समायोजित करने के बाद मालिकों को ₹25.62 लाख और चुकाने होंगे, क्योंकि ₹50 लाख पहले ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जारी किए जा चुके हैं।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी पक्ष को ब्याज नहीं मिलेगा और दोनों पक्ष अपने-अपने खर्च खुद उठाएंगे।
Case Details
Case Title: Bhupesh Bhayana and Another v. Kunal Seth and Another
Case Number: Civil Appeal Nos. … of 2026 arising out of SLP (C) Diary No. 20732 of 2024
Judges: Justice Sanjay Kumar and Justice K. Vinod Chandran
Decision Date: May 26, 2026











