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सह-आरोपी के बेटे का अदालत में प्रतिनिधित्व करने वाले वकील के खिलाफ धोखाधड़ी का कोई मामला नहीं बनता: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि अपने सह-आरोपी बेटे की ओर से अदालत में पेश होना अपने आप में धोखाधड़ी नहीं है और वकील के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। - सुरेश प्रसाद खरे बनाम मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय

Shivam Y.
सह-आरोपी के बेटे का अदालत में प्रतिनिधित्व करने वाले वकील के खिलाफ धोखाधड़ी का कोई मामला नहीं बनता: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस वकील के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी, जिस पर अपने बेटे और सह-आरोपी की ओर से अदालत में पेश होकर कोर्ट से धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया गया था।

मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने कहा कि मामले में प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी का कोई अपराध नहीं बनता।

मामला क्या था

साल 2017 में टीकमगढ़ जिले के जतारा थाने में धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया था। शुरुआत में शिकायत सुरेश प्रसाद खरे के बेटे रूपेश खरे के खिलाफ थी, लेकिन बाद में सुरेश प्रसाद खरे को भी सह-आरोपी बना दिया गया।

मामले के दौरान रूपेश खरे की ओर से हाईकोर्ट में FIR रद्द करने की याचिका दायर की गई, जिसमें सुरेश प्रसाद खरे बतौर वकील पेश हुए। इसके बाद अदालत के समक्ष यह सवाल उठा कि एक सह-आरोपी दूसरे सह-आरोपी की ओर से वकील के रूप में कैसे पेश हो सकता है।

सिंगल बेंच ने यह भी माना था कि याचिकाकर्ता ने अपनी पहले खारिज हो चुकी याचिका की जानकारी अदालत को नहीं दी और इसे अदालत के साथ “धोखाधड़ी” माना गया था।

डिवीजन बेंच ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए कहा कि जिस याचिका को छिपाने का आरोप लगाया गया, वह बाद में खारिज हुई थी। अदालत ने कहा कि बेटे की याचिका जनवरी 2019 में दायर हुई थी, जबकि पिता की याचिका मार्च 2020 में खारिज हुई। इसलिए तथ्यों को छिपाने का आरोप टिकता नहीं है।

अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम के नियम 13 का भी हवाला दिया और कहा कि यह नियम किसी सह-आरोपी को वकील के रूप में पेश होने से नहीं रोकता।

पीठ ने कहा,

“सिर्फ सह-आरोपी की ओर से पेश होना अपने आप में अदालत के साथ fraud नहीं माना जा सकता।”

हाईकोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 के तहत जिन अपराधों पर कार्यवाही हो सकती है, उनमें IPC की धारा 417 शामिल नहीं है। इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेना भी कानूनन गलत था।

इसी आधार पर अदालत ने 23 सितंबर 2025 का आदेश रद्द करते हुए सुरेश प्रसाद खरे के खिलाफ लंबित पूरी आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी।

Case Details:

Case Title: Suresh Pradsad Khare v. The High Court of Madhya Pradesh

Case Number: CRR No. 5561 of 2025

Judge: Chief Justice Sanjeev Sachdeva and Justice Vinay Saraf

Decision Date: 22 May 2026

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