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सुप्रीम कोर्ट ने बीच ट्रायल में पक्ष बदलने की अनुमति देने से किया इनकार, कलकत्ता हाईकोर्ट का आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल शुरू होने के बाद कोई पक्ष अतिरिक्त लिखित बयान के जरिए अपना पूरा रुख नहीं बदल सकता। - मोंदिरा घोष बनाम चैताली घोष

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सुप्रीम कोर्ट ने बीच ट्रायल में पक्ष बदलने की अनुमति देने से किया इनकार, कलकत्ता हाईकोर्ट का आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक संपत्ति विवाद मामले में प्रतिवादी को ट्रायल के दौरान अतिरिक्त लिखित बयान दाखिल करने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने कहा कि यह केवल नए तथ्यों को जोड़ने का मामला नहीं था, बल्कि मुकदमे में पूरी तरह नया और विरोधाभासी रुख अपनाने की कोशिश थी।

यह फैसला न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 26 मई 2026 को सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

मोंदिरा घोष ने कोलकाता की सिटी सिविल कोर्ट में चैताली घोष के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। याचिका में कहा गया था कि प्रतिवादी संपत्ति पर अवैध कब्जे में है और उसे बेदखल किया जाए। साथ ही हर्जाना और खर्च की भी मांग की गई थी।

प्रतिवादी ने 2022 में दाखिल अपने मूल लिखित बयान में खुद को संपत्ति की “बोनाफाइड को-शेयरर” बताया था और वादी के दावों से इनकार किया था।

मई 2023 में मुद्दे तय हो चुके थे और ट्रायल भी शुरू हो चुका था। वादी के गवाह से कई तारीखों पर जिरह हो चुकी थी।

इसी दौरान प्रतिवादी ने Order 8 Rule 9 CPC के तहत अतिरिक्त लिखित बयान और काउंटर क्लेम दाखिल करने की अनुमति मांगी। ट्रायल कोर्ट ने जून 2025 में यह आवेदन खारिज कर दिया।

ट्रायल कोर्ट ने कहा कि पहले प्रतिवादी खुद को सह-स्वामी बता रही थी, लेकिन अब वह खुद को वादी की किरायेदार बता रही है। अदालत ने माना कि मुकदमे के इस चरण में इतना बड़ा बदलाव स्वीकार नहीं किया जा सकता।

प्रतिवादी ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल शुरू होने के बाद काउंटर क्लेम स्वीकार नहीं किया जा सकता। हालांकि अदालत ने ₹15,000 की लागत पर अतिरिक्त लिखित बयान दाखिल करने की अनुमति दे दी। हाईकोर्ट ने कहा कि नए तथ्य विवाद के वास्तविक समाधान के लिए जरूरी हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की दलीलों से असहमति जताई। अदालत ने कहा कि यह केवल कुछ छूटे हुए तथ्यों को जोड़ने का मामला नहीं था, बल्कि प्रतिवादी अपने कब्जे और स्थिति को लेकर पूरी तरह नया रुख अपना रही थी।

पीठ ने कहा,

“प्रतिवादी अपने पहले के रुख से पूरी तरह पलटकर अब खुद को वादी की किरायेदार बताना चाहती थी।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि Order 6 Rule 7 CPC के तहत कोई पक्ष पहले दिए गए बयान के विपरीत नया दावा नहीं कर सकता, जब तक उचित संशोधन की प्रक्रिया न अपनाई जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रतिवादी ने Order 6 Rule 17 CPC के तहत संशोधन पर लगी रोक से बचने के लिए यह तरीका अपनाया। अदालत ने इसे “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट का 3 सितंबर 2025 का आदेश रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट का आदेश बहाल कर दिया, जिसमें अतिरिक्त लिखित बयान दाखिल करने की अनुमति से इनकार किया गया था।

अदालत ने पक्षकारों को अपने-अपने खर्च वहन करने का निर्देश दिया।

Case Details

Case Title: Mondira Ghosh v. Chaitali Ghosh

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 34411 of 2025

Court: Supreme Court of India

Judges: Justice Sanjay Kumar and Justice K. Vinod Chandran

Decision Date: May 26, 2026

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