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पैसे लौटाने के वादे के साथ लिया गया निजी ऋण भी MPID Act के दायरे में आ सकता है: सुप्रीम कोर्ट

सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि ब्याज सहित पुनर्भुगतान के वादे के साथ दिया गया धन, भले ही उसे ऋण के रूप में वर्णित किया गया हो, एमपीआईडी ​​अधिनियम के तहत "जमा" के रूप में योग्य हो सकता है। - अलका अग्रवाल और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य

Rajan Prajapati
पैसे लौटाने के वादे के साथ लिया गया निजी ऋण भी MPID Act के दायरे में आ सकता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र प्रोटेक्शन ऑफ इंटरेस्ट ऑफ डिपॉजिटर्स (MPID) Act की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण फैसला दिया है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति या संस्था को ब्याज के साथ लौटाने के वादे पर दिया गया पैसा केवल “लोन” कह देने से MPID Act के दायरे से बाहर नहीं हो जाता।

कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें निवेशकों की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी गई थी कि मामला केवल सिविल विवाद और “लोन ट्रांजैक्शन” का है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले में अपीलकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि 2016 में उन्हें महाराष्ट्र के ताडोबा में रिसॉर्ट प्रोजेक्ट लगाने के नाम पर निवेश के लिए प्रेरित किया गया। बदले में 24 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आश्वासन दिया गया था।

रिकॉर्ड के अनुसार, अपीलकर्ताओं ने कुल 2.51 करोड़ रुपये चेक और बैंक ट्रांसफर के जरिए प्रतिवादियों को दिए थे। रकम 31 दिसंबर 2019 तक लौटाई जानी थी, लेकिन न तो ब्याज मिला और न ही मूल राशि वापस की गई।

बाद में निवेशकों ने कानूनी नोटिस भेजा, पुलिस शिकायत दी और कई सिविल व आपराधिक कार्यवाही शुरू कीं। हालांकि, पहले IPC की धाराओं के तहत दर्ज कराने की कोशिशें सफल नहीं हुईं।

इसके बाद निवेशकों ने MPID Act के तहत कार्रवाई की मांग की, लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया कि मामला “लोन” का है और प्रतिवादी “फाइनेंशियल एस्टैब्लिशमेंट” नहीं हैं।

जस्टिस एन.वी. अंजारिया और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने MPID Act की परिभाषाओं का विस्तार से विश्लेषण किया। अदालत ने कहा कि “डिपॉजिट” की परिभाषा बहुत व्यापक है और इसमें ऐसा कोई भी पैसा शामिल हो सकता है जिसे बाद में लौटाने का वादा किया गया हो।

पीठ ने कहा,

“केवल किसी लेन-देन को ‘लोन’ कह देने से वह MPID Act के तहत ‘डिपॉजिट’ होने से बाहर नहीं हो जाता।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि “फाइनेंशियल एस्टैब्लिशमेंट” की परिभाषा भी काफी विस्तृत है और इसमें “कोई भी व्यक्ति” शामिल हो सकता है जो किसी व्यवस्था के तहत पैसा स्वीकार करता है।

अदालत ने माना कि अपीलकर्ताओं द्वारा दी गई रकम, उसे लौटाने का वादा और ब्याज का आश्वासन - ये सभी तत्व MPID Act की धारा 2(c) में दी गई “डिपॉजिट” की परिभाषा को पूरा करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इसलिए कि IPC के तहत कथित अपराध साबित नहीं हुए, MPID Act के तहत कार्रवाई पर रोक नहीं लगाई जा सकती।

पीठ ने कहा कि IPC और MPID Act अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं हैं और दोनों का उद्देश्य तथा दायरा अलग है।

कोर्ट ने यह दलील भी खारिज कर दी कि मामला केवल सिविल प्रकृति का है। अदालत के अनुसार, यदि लेन-देन MPID Act की परिभाषा में आता है, तो निवेशकों को उस कानून के तहत उपलब्ध उपायों का अधिकार रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 14 अगस्त 2025 के आदेश को “कानूनन पूरी तरह गलत” बताते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता MPID Act की धारा 3 के तहत कार्रवाई शुरू करने और कानून के अंतर्गत उपलब्ध उपायों का लाभ लेने के हकदार हैं।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली।

Case Details

Case Title: Alka Agrawal and Others v. State of Maharashtra and Others

Case Number: Criminal Appeal No. 2537 of 2026

Judge: Justice N.V. Anjaria and Justice Manoj Misra

Decision Date: May 15, 2026

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