मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

सुप्रीम कोर्ट ने हत्या और एससी/एसटी अत्याचार केस में दी गई जमानत रद्द की, आरोपियों को सरेंडर का आदेश

शोभा नामदेव सोनवणे बनाम समाधान बाजीराव सोनवणे एवं अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने हत्या और एससी/एसटी अत्याचार मामले में हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत रद्द की, आरोपियों को चार सप्ताह में सरेंडर का आदेश।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने हत्या और एससी/एसटी अत्याचार केस में दी गई जमानत रद्द की, आरोपियों को सरेंडर का आदेश

दिल्ली के कोर्ट नंबर में सोमवार को माहौल गंभीर था। मामला एक ऐसी हत्या से जुड़ा था जिसमें जातिगत अपमान और सामूहिक हमला दोनों के आरोप लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को रद्द करते हुए साफ कहा कि गंभीर अपराधों में जमानत देते समय अदालतों को बेहद सावधानी बरतनी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के कोपरगांव का है। शिकायतकर्ता शोभा नामदेव सोनावणे ने 19 अगस्त 2022 को एफआईआर दर्ज कराई थी।

Read also:- 17 साल की लड़की ने माता-पिता संग जाने से किया इनकार, गुजरात हाईकोर्ट ने चिल्ड्रन होम भेजने का दिया आदेश

शिकायत के अनुसार, उनके पति नामदेव सोनावणे पर छह लोगों ने लोहे की रॉड और डंडों से हमला किया। आरोप है कि हमले के दौरान उन्हें जातिसूचक शब्द कहे गए और अपमानित किया गया। बीच-बचाव करने पर शिकायतकर्ता को भी पीटा गया।

24 अगस्त 2022 को इलाज के दौरान नामदेव की मौत हो गई। इसके बाद हत्या (धारा 302 IPC) और एससी/एसटी अत्याचार अधिनियम की धाराएँ जोड़ी गईं।

बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने मार्च 2023 में दो आरोपियों को जमानत दे दी थी। इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

अपीलकर्ता की दलील

अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि हाईकोर्ट ने गंभीर आरोपों और प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयानों को नजरअंदाज किया।

वकील ने दलील दी कि एफआईआर में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि आरोपियों ने लोहे की रॉड और डंडे से हमला किया। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने यह कहते हुए जमानत दे दी कि यह स्पष्ट नहीं है कि किस आरोपी ने कौन सी चोट पहुंचाई।

Read also:- दादा-दादी 'फैमिली' में नहीं: मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, स्टांप ड्यूटी में छूट नहीं मिलेगी

दलील में यह भी कहा गया कि लंबित सिविल विवाद को जमानत का आधार बनाना गलत है, क्योंकि वही विवाद हमले की वजह बना।

राज्य की ओर से क्या कहा गया

महाराष्ट्र सरकार की ओर से भी जमानत रद्द करने का समर्थन किया गया।

राज्य ने अदालत को बताया कि मृतक को कई गंभीर चोटें आई थीं और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में सिर पर गंभीर चोट का उल्लेख है, जिससे मस्तिष्क को नुकसान हुआ।

सरकार का कहना था कि यह संगठित हमला था और जातिगत अपमान के आरोप भी गंभीर हैं।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने स्पष्ट किया कि जमानत रद्द करना और जमानत आदेश को पलटना दो अलग बातें हैं।

अदालत ने कहा कि यदि जमानत आदेश “प्रासंगिक तथ्यों की अनदेखी” या “अप्रासंगिक कारणों” पर आधारित हो, तो उच्च अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है।

कोर्ट ने कहा,

“गंभीर अपराधों में जमानत देते समय आरोपों की प्रकृति, अपराध की गंभीरता और समाज पर उसके प्रभाव को ध्यान में रखना जरूरी है।”

अदालत ने यह भी कहा कि जब मामला गैरकानूनी जमावड़े (unlawful assembly) का हो, तो हर सदस्य समान रूप से जिम्मेदार होता है। ऐसे में यह कहना कि किसने कौन सी चोट पहुंचाई, जमानत देने का आधार नहीं बन सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि घटना और मौत के बीच पांच दिन का अंतर है, जिससे संदेह पैदा होता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह मुद्दा ट्रायल के दौरान साक्ष्य के आधार पर तय होगा, न कि जमानत के स्तर पर।

Read also:- ट्रांसफर विवाद पर सुलह: सिक्किम हाईकोर्ट ने आपसी समझ से खत्म की NHM कर्मचारी की याचिका

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का जमानत आदेश रद्द कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि दोनों आरोपी चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करें। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो ट्रायल कोर्ट उन्हें हिरासत में लेने के लिए आवश्यक कदम उठाए।

साथ ही, ट्रायल कोर्ट को एक वर्ष के भीतर मुकदमे का निपटारा करने का निर्देश दिया गया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत के मुद्दे तक सीमित हैं और ट्रायल कोर्ट स्वतंत्र रूप से साक्ष्यों के आधार पर फैसला करेगा।

अपील स्वीकार कर ली गई।

Case Title: Shobha Namdev Sonavane v. Samadhan Bajirao Sonvane & Ors.

Case No.: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 12440 of 2023

Decision Date: 23 February 2026

More Stories