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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी विधायक अब्बास अंसारी को सशर्त अंतरिम जमानत दी

सुप्रीम कोर्ट ने गैंगस्टर्स एक्ट के तहत दर्ज मामले में उत्तर प्रदेश के विधायक अब्बास अंसारी को अंतरिम जमानत दी, लेकिन उनके आवागमन और सार्वजनिक बयानों पर कड़ी शर्तें लगाई हैं।

Shivam Y.
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी विधायक अब्बास अंसारी को सशर्त अंतरिम जमानत दी

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 7 मार्च 2025 को उत्तर प्रदेश के विधायक अब्बास अंसारी को उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स और असामाजिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत दर्ज आपराधिक मामले में अंतरिम जमानत प्रदान की।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने अंसारी को अस्थायी राहत दी, लेकिन जमानत पर सख्त शर्तें लगाई। अदालत ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि वह विशेष न्यायाधीश (ट्रायल कोर्ट) की पूर्व अनुमति के बिना उत्तर प्रदेश से बाहर नहीं जा सकते। इसके अलावा, उन्हें लखनऊ स्थित आधिकारिक आवास पर रहना होगा और अपने निर्वाचन क्षेत्र मऊ जाने के लिए ट्रायल कोर्ट और जिला पुलिस से पूर्व स्वीकृति लेनी होगी। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि वह चल रहे कानूनी मामलों पर कोई सार्वजनिक बयान नहीं दे सकते।

मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद होगी और तब तक न्यायालय ने ट्रायल की प्रगति पर एक स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

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अदालत में प्रस्तुत तर्क

अब्बास अंसारी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को अन्य मामलों में पहले ही जमानत मिल चुकी है। सिब्बल ने यह भी बताया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पहले समान आरोपों वाली एफआईआर को रद्द कर दिया था, हालांकि अदालत ने आवश्यक होने पर नई एफआईआर दर्ज करने की स्वतंत्रता दी थी। उन्होंने यह भी जोर दिया कि वर्तमान मामले में सभी गवाह पुलिस अधिकारी हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि गवाहों को धमकाने का कोई जोखिम नहीं है।

"चार्जशीट देखिए, यह बहुत दिलचस्प है। इसमें केवल पुलिस अधिकारी ही गवाह हैं, और वह भी किस बात के लिए? वे केवल यह कहते हैं कि उन्होंने सुना कि एक गिरोह सक्रिय है। बस इतना ही। पहले की एफआईआर में भी यही कहा गया था, जिसे बिना उचित विचार के खारिज कर दिया गया था। अब तक जितने भी मामले दर्ज हुए, उनमें मुझे जमानत मिल चुकी है। यह आखिरी मामला है... यह संभव नहीं कि कोर्ट लगातार हमें जमानत देती जा रही हो और अभियोजन पक्ष सही हो," सिब्बल ने तर्क दिया।

सिब्बल ने आगे कहा कि इस मामले में सभी साक्ष्य पहले ही एकत्र किए जा चुके हैं, इसलिए अंसारी को हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं है।

दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने जमानत याचिका का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि अंसारी एक प्रभावशाली व्यक्ति हैं और जमानत मिलने पर वे सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं और गवाहों को धमका सकते हैं।

"वह एक अत्यधिक प्रभावशाली व्यक्ति हैं और उनकी पहुंच किसी भी हद तक जा सकती है। वह समाज के लिए खतरा हैं। यदि उन्हें रिहा किया जाता है, तो वे सबूतों में हेरफेर कर सकते हैं और गवाहों को धमका सकते हैं," नटराज ने अदालत में दलील दी।

राज्य सरकार के वकील ने यह भी अनुरोध किया कि कम से कम दो या तीन प्रमुख गवाहों की गवाही होने तक जमानत न दी जाए।

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अदालत के अवलोकन और निर्णय

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने राज्य सरकार के तर्क का जवाब देते हुए पूछा कि आरोपी को कब तक बिना मुकदमे के जेल में रखा जा सकता है।

"आप उसे कब तक जेल में रखेंगे? हम आप पर दबाव नहीं डालना चाहते कि आप एक महीने में ट्रायल पूरा करें, लेकिन अनावश्यक देरी भी न्याय के लिए हानिकारक होती है, विशेष रूप से पीड़ितों के लिए। आपराधिक न्यायशास्त्र, जो मुख्य रूप से आरोपी-केंद्रित होता है, उसमें हमें पीड़ितों के हितों पर भी ध्यान देना चाहिए," न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा।

जब सिब्बल ने दोहराया कि सभी गवाह पुलिस अधिकारी हैं और उन्हें धमकाने का कोई खतरा नहीं है, तो न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को भी धमकी दी जा सकती है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि यह मामला निजी गवाहों से संबंधित नहीं है, इसलिए अदालत को गवाहों को धमकाने की संभावना को लेकर अधिक चिंता नहीं है।

चूंकि इस मामले में चार सह-आरोपी अभी भी फरार हैं, जिससे ट्रायल में देरी हो सकती है, अदालत ने अब्बास अंसारी को अंतरिम जमानत देने का फैसला किया। हालांकि, अदालत ने उनके आवागमन पर सख्त प्रतिबंध जारी रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल विशेष अनुमति याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी, जिसमें 18 दिसंबर 2024 को अब्बास अंसारी की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए उनकी जमानत याचिका अस्वीकार कर दी थी कि उनके खिलाफ जिला स्तर पर सक्रिय एक गिरोह से जुड़े होने के पर्याप्त सबूत हैं, उनका आपराधिक इतिहास है, और जमानत मिलने पर वे सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं और गवाहों को धमका सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने से पहले अंसारी ने उच्च न्यायालय में जमानत मांगी थी, जिसे खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने पहले उन्हें निर्देश दिया था कि वे पहले उच्च न्यायालय में सभी कानूनी उपायों का उपयोग करें और फिर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करें।

मामले का नाम: अब्बास अंसारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

मामला संख्या: SLP(Crl) No. 1091/2025

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