मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

CrPC धारा 319: मामूली विरोधाभास के आधार पर अतिरिक्त आरोपी को ट्रायल से बाहर नहीं रखा जा सकता - सुप्रीम कोर्ट

सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि गवाहों के बयानों में मामूली विसंगतियां अदालतों को धारा 319 सीआरपीसी के तहत अतिरिक्त आरोपी को तलब करने से नहीं रोक सकतीं, यदि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य मजबूत और ठोस हों। - मोहम्मद कलीम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य।

Shivam Y.
CrPC धारा 319: मामूली विरोधाभास के आधार पर अतिरिक्त आरोपी को ट्रायल से बाहर नहीं रखा जा सकता - सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत अतिरिक्त आरोपियों को समन जारी करने के चरण पर अदालत को अत्यधिक कठोर मानक लागू नहीं करना चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि गवाहों के बयान प्रथमदृष्टया मजबूत और विश्वसनीय हैं, तो मामूली विरोधाभास के आधार पर आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता।

न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट और इलाहबाद उच्च न्यायालय के आदेशों को रद्द करते हुए दो व्यक्तियों को अतिरिक्त आरोपी के रूप में ट्रायल में शामिल करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला 22 अगस्त 2017 को मुज़फ्फरनगर में हुए एक हत्या कांड से जुड़ा है। शिकायतकर्ता मोहम्मद कलीम ने पुलिस में दर्ज FIR में आरोप लगाया था कि उनके साथ स्कूटर पर जा रहे मोहम्मद अम्मार पर मोटरसाइकिल सवार आरोपियों ने गोलीबारी की, जिससे उनकी मौत हो गई।

Read also:- मोटर दुर्घटना मुआवज़े से ग्रुप इंश्योरेंस राशि नहीं घटेगी: सुप्रीम कोर्ट

जांच के बाद पुलिस ने कुछ आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। हालांकि, शिकायतकर्ता का कहना था कि राजेंद्र और मौसम भी इस हत्या की साजिश में शामिल थे।

इस आधार पर ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत आवेदन देकर इन दोनों व्यक्तियों को अतिरिक्त आरोपी के रूप में तलब करने की मांग की।

ट्रायल कोर्ट ने इस आवेदन को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता (PW-1) और अन्य गवाहों PW-6 व PW-7 के बयानों में कई विरोधाभास हैं।

Read also:- सुप्रीम कोर्ट: गोद लेने वाली माताओं के साथ भेदभाव नहीं हो सकता, मातृत्व केवल जैविक जन्म तक सीमित नहीं

ट्रायल कोर्ट के अनुसार:

  • कथित साजिश की बैठक के बारे में गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।
  • जेल में मुलाकात का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया।
  • घटना के संबंध में FIR और गवाहों के बाद के बयान में अंतर था।

इन कारणों से ट्रायल कोर्ट ने माना कि अतिरिक्त आरोपियों को तलब करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। बाद में हाईकोर्ट ने भी इस आदेश को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत आवश्यक मानक से अधिक कठोर परीक्षण लागू कर दिया।

अदालत ने कहा कि इस चरण पर अदालत को यह नहीं देखना चाहिए कि आरोप सिद्ध होंगे या नहीं, बल्कि यह देखना चाहिए कि क्या उपलब्ध साक्ष्य से आरोपी की संभावित संलिप्तता का मजबूत संकेत मिलता है।

Read also:- निजी हित छिपाकर PIL दाखिल करने पर राजस्थान हाईकोर्ट सख्त, याचिकाकर्ता को ₹25 लाख लागत का नोटिस

पीठ ने कहा:

“दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत अदालत को केवल यह देखना होता है कि उपलब्ध साक्ष्य मजबूत और विश्वसनीय हैं या नहीं। इस स्तर पर विस्तृत विश्वसनीयता परीक्षण या मिनी ट्रायल करना उचित नहीं है।”

अदालत ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने गवाहों के बयानों में मामूली विरोधाभासों को अलग-अलग करके देखा, जबकि साक्ष्य का समग्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए था।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों के शपथपूर्वक दिए गए बयान इस मामले में “strong and cogent evidence” के मानक को पूरा करते हैं।

इसके आधार पर अदालत ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया और राजेंद्र और मौसम को अतिरिक्त आरोपी के रूप में ट्रायल में शामिल करने का निर्देश दिया।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने आदेश की प्रति इलाहाबाद हाईकोर्ट के माध्यम से ट्रायल कोर्ट को भेजने का निर्देश दिया ताकि आगे की कार्यवाही कानून के अनुसार की जा सके।

Case Title: Mohammad Kaleem v. State of Uttar Pradesh & Ors.

Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 11085 of 2023

More Stories