एक बुजुर्ग दंपति की आग में जलकर मौत के मामले में लंबे समय से चल रही कानूनी लड़ाई का अंत सुप्रीम कोर्ट में हुआ। अदालत ने कहा कि जांच में गंभीर खामियां और अविश्वसनीय साक्ष्य होने के कारण आरोपी बेटे और बहू को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट द्वारा दिए गए बरी करने के फैसले को बरकरार रखा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बिहार के महादेओपुर गांव का है। 23 नवंबर 2016 की रात एक झोपड़ीनुमा घर में आग लगने से अधेड़ उम्र के वकील सरंगधर सिंह की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि उनकी पत्नी कमला देवी गंभीर रूप से झुलस गईं और दो दिन बाद अस्पताल में उनका निधन हो गया।
Read also:- दिल्ली हाईकोर्ट में लंच पर संकट: एलपीजी की कमी से कैंटीन में बिरयानी-दाल मखनी बंद
पुलिस का आरोप था कि दंपति के छोटे बेटे और उसकी पत्नी ने संपत्ति विवाद के कारण घर में आग लगाकर अपने माता-पिता की हत्या की।
ट्रायल कोर्ट ने इन आरोपों को स्वीकार करते हुए बेटे और बहू को दोषी ठहराया था। हालांकि बाद में पटना हाईकोर्ट ने साक्ष्यों में संदेह देखते हुए दोनों को बरी कर दिया। इसी फैसले को चुनौती देते हुए मृतक दंपति के बड़े बेटे ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
अदालत के सामने मुख्य सवाल
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या मामले में मौजूद कथित “डाइंग डिक्लेरेशन” (मृत्यु से पहले दिया गया बयान) और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त हैं।
अपीलकर्ता का तर्क था कि मृतका ने कई लोगों के सामने अपने बेटे और बहू को जिम्मेदार ठहराया था। इसलिए हाईकोर्ट को ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि आदेश को बरकरार रखना चाहिए था।
दूसरी ओर बचाव पक्ष ने कहा कि जांच एजेंसी ने पक्षपातपूर्ण तरीके से जांच की और साक्ष्य गढ़ने की कोशिश की, जिससे पूरे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने फैसले में कहा कि अत्यधिक उत्साही या पक्षपातपूर्ण जांच भी उतनी ही खतरनाक होती है जितनी लापरवाही भरी जांच।
पीठ ने कहा:
“जब जांच सार्वजनिक धारणाओं और व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों के आधार पर की जाती है, तो सच सामने आने के बजाय निर्दोष व्यक्ति फंस सकता है और असली अपराधी बच निकलता है।”
अदालत ने पाया कि मामले में कई कथित डाइंग डिक्लेरेशन पेश किए गए, लेकिन वे आपस में मेल नहीं खाते और उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि घायल महिला के बयान दर्ज करते समय डॉक्टर की प्रमाणिकता नहीं ली गई और कई गवाहों के बयान भी विरोधाभासी थे।
Read also:- सुप्रीम कोर्ट: अधूरे सबूतों के कारण 2010 के हत्या मामले में पूरनमल को बरी कर दिया गया।
जांच में गंभीर खामियां
सुप्रीम कोर्ट ने जांच प्रक्रिया पर भी कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि:
- घटनास्थल का ठीक से निरीक्षण नहीं किया गया
- आग लगने के कारण की फॉरेंसिक जांच नहीं हुई
- कई अहम प्रत्यक्षदर्शियों को गवाह नहीं बनाया गया
- एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई
- घटनास्थल से बरामद कथित दस्तावेजों की जब्ती प्रक्रिया सही तरीके से नहीं हुई
पीठ ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में अभियोजन एक मजबूत और लगातार साक्ष्य श्रृंखला प्रस्तुत करने में विफल रहा।
गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल
अदालत ने यह भी नोट किया कि जिन गवाहों को अदालत में पेश किया गया, उनमें से कई मृतक परिवार के करीबी रिश्तेदार थे और उनके बयान आपस में मेल नहीं खाते।
कोर्ट के अनुसार, गांव में मौजूद ऐसे स्वतंत्र गवाहों को पेश नहीं किया गया जो सबसे पहले घटनास्थल पर पहुंचे थे। इससे अभियोजन की कहानी और कमजोर हो गई।
Read also:- चेक बाउंस केस में बड़ी टिप्पणी: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, ट्रायल टालने की कोशिश बताया;
अदालत का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए संदेह से परे ठोस साक्ष्य होना जरूरी है। इस मामले में ऐसा कोई भरोसेमंद साक्ष्य सामने नहीं आया।
पीठ ने निष्कर्ष देते हुए कहा कि हाईकोर्ट का फैसला सही था और आरोपियों के खिलाफ अपराध साबित नहीं होता।
अदालत ने अपील खारिज करते हुए बेटे और बहू को बरी करने के हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
Case Title: Sanjay Kumar Sharma v. State of Bihar & Others
Case No.: Criminal Appeal (arising out of SLP (Crl.) No. 15378 of 2024)
Decision Date: 11 March 2026










