चेक बाउंस से जुड़े एक मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम आदेश देते हुए आरोपी की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि मुकदमे के अंतिम चरण में हस्ताक्षर की जांच के लिए विशेषज्ञ बुलाने की मांग करना देरी की रणनीति जैसा प्रतीत होता है।
हालांकि, अदालत ने दोनों पक्षों की सहमति को देखते हुए मामले को मध्यस्थता (मेडिएशन) के लिए भेजने का निर्देश दिया ताकि विवाद का आपसी समाधान संभव हो सके।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला लुधियाना की एक अदालत में लंबित चेक बाउंस शिकायत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता कुलबीर सिंह ने आरोप लगाया कि कारोबारी लेन-देन के चलते आरोपी सोनू कुमार पर लगभग 19,49,230 रुपये की देनदारी थी।
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आरोप है कि भुगतान के लिए दिया गया चेक बैंक द्वारा इसलिए लौटाया गया क्योंकि भुगतान रोक दिया गया था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत शिकायत दायर की।
ट्रायल के दौरान आरोपी ने अदालत से अनुमति मांगी कि पावर ऑफ अटॉर्नी दस्तावेज़ पर मौजूद हस्ताक्षरों की तुलना नोटरी रजिस्टर में मौजूद हस्ताक्षरों से कराने के लिए हस्तलिपि और फिंगरप्रिंट विशेषज्ञ को बुलाया जाए।
लेकिन लुधियाना की न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने अक्टूबर 2025 में यह आवेदन खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।
जस्टिस अनूप चितकारा की पीठ ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि आरोपी को पहले ही अपने बचाव के लिए पर्याप्त अवसर दिए जा चुके थे।
अदालत ने पाया कि आरोपी ने 15 बार अवसर मिलने के बावजूद अपने बचाव के साक्ष्य पूरे नहीं किए और बाद में विशेषज्ञ बुलाने का आवेदन दायर किया।
पीठ ने कहा कि यह भी महत्वपूर्ण है कि आरोपी ने अपने बयान में पहले कभी यह दावा नहीं किया था कि पावर ऑफ अटॉर्नी पर हस्ताक्षर जाली हैं।
अदालत ने टिप्पणी की,
“रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि मुकदमा अंतिम चरण में है और इस स्तर पर हस्ताक्षर तुलना का आवेदन केवल कार्यवाही को लंबा करने का प्रयास प्रतीत होता है।”
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अदालत ने यह भी कहा कि जिस दस्तावेज़ से तुलना की मांग की गई थी वह केवल फोटोकॉपी था, जबकि हस्ताक्षर की जांच सामान्यतः मूल दस्तावेज़ से ही की जा सकती है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने चेक बाउंस मामलों की प्रकृति पर भी विस्तार से टिप्पणी की।
पीठ ने कहा कि चेक किसी वित्तीय दायित्व को चुकाने का एक भरोसेमंद माध्यम माना जाता है और इसका अनादर व्यापारिक विश्वास को प्रभावित करता है।
अदालत ने कहा,
“चेक जारी करना इस बात का गंभीर वादा है कि प्रस्तुत होने पर भुगतान किया जाएगा। जब चेक लौटता है तो यह वित्तीय भरोसे के उल्लंघन के रूप में देखा जाता है।”.
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साथ ही अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे मामलों में लंबी अदालती प्रक्रिया दोनों पक्षों के लिए नुकसानदेह हो सकती है, इसलिए मध्यस्थता एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।
दोनों पक्षों ने अदालत के समक्ष यह संकेत दिया कि वे विवाद को मध्यस्थता के माध्यम से सुलझाने का प्रयास करने को तैयार हैं।
इस पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि 30 दिनों के भीतर मध्यस्थता सफल नहीं होती, तो ट्रायल की कार्यवाही फिर से शुरू की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है और हस्ताक्षर विशेषज्ञ बुलाने की अनुमति न देने का फैसला सही था।
अदालत ने अंततः पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए कहा कि मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा जाए, लेकिन यदि मध्यस्थता विफल रहती है तो मुकदमे की कार्यवाही आगे जारी रहेगी।
Case Title:- Sonu Kumar vs Kulbir Singh
Case Number:- CRR-2873-2025 (O&M)
Judgment Pronounced On: 10 March 2026










