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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मुआवज़े से कटेगी 2006 नियमों की सहायता, हाईकोर्ट का आदेश रद्द

रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम कनिका एंड अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने रिलायंस जनरल इंश्योरेंस मामले में कहा कि 2006 नियमों की आर्थिक सहायता मुआवज़े से घटेगी। सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण आदेश रद्द।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मुआवज़े से कटेगी 2006 नियमों की सहायता, हाईकोर्ट का आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवज़े से जुड़े एक अहम विवाद में साफ कर दिया है कि हरियाणा सरकार के 2006 नियमों के तहत मिली आर्थिक सहायता को दोबारा मुआवज़े के रूप में नहीं दिया जा सकता। अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के ‘स्पष्टीकरण आदेश’ को रद्द करते हुए उसका मूल आदेश बहाल कर दिया।

यह मामला बीमा कंपनी और मृतक कर्मचारी के परिवार के बीच मुआवज़े की गणना को लेकर था।

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मामले की पृष्ठभूमि

2 नवंबर 2009 को एक सड़क दुर्घटना में मोटरसाइकिल सवार महिला कर्मचारी की मौत हो गई। वह हरियाणा सरकार के स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत थीं। उनके परिवार ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT), रोहतक में मुआवज़े की याचिका दायर की।

ट्रिब्यूनल ने 9 अक्टूबर 2010 को 8.80 लाख रुपये, 7.5% ब्याज सहित देने का आदेश दिया। परिवार ने इस राशि को कम बताते हुए हाईकोर्ट में अपील की।

हाईकोर्ट ने 18 सितंबर 2019 के आदेश में मुआवज़ा बढ़ाकर लगभग 29 लाख रुपये कर दिया, लेकिन कहा कि हरियाणा के Compassionate Assistance to Dependents of Deceased Government Employees Rules, 2006 के तहत जो राशि परिवार को मिली है, उसे कुल मुआवज़े से घटाया जाएगा।

बाद में एक “स्पष्टीकरण आवेदन” दाखिल हुआ। 17 जनवरी 2023 के आदेश में हाईकोर्ट ने अपना रुख बदलते हुए कहा कि पूरी सहायता राशि नहीं घटेगी। इसी आदेश को बीमा कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

मुख्य प्रश्न यह था - क्या 2006 नियमों के तहत मिली आर्थिक सहायता को मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत दिए गए मुआवज़े से घटाया जाना चाहिए या नहीं?

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सुप्रीम कोर्ट की कानूनी पड़ताल

पीठ ने अपने पूर्व निर्णय Reliance General Insurance Co. Ltd. v. Shashi Sharma का हवाला दिया। उस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि:

  • जो सहायता मृतक के वेतन और भत्तों के बराबर है, उसे मुआवज़े से घटाया जा सकता है, ताकि दोहरा लाभ न मिले।
  • लेकिन पेंशन, भविष्य निधि, बीमा या अन्य लाभ, जो आय के सीधे बदले नहीं हैं, उन्हें नहीं घटाया जा सकता।

अदालत ने कहा, “दावा अधिकरण को न्यायसंगत मुआवज़ा तय करना होता है। यदि वेतन के बराबर सहायता पहले ही मिल चुकी है, तो वही राशि दोबारा नहीं दी जा सकती।”

परिवार की ओर से तर्क दिया गया कि बाद के फैसले National Insurance Company Ltd. v. Birender में अलग दृष्टिकोण अपनाया गया है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों फैसले एक-दूसरे के विपरीत नहीं हैं। अदालत ने कहा कि शशि शर्मा मामला यह बताता है कि क्या घटाया जाएगा, जबकि बीरेंद्र मामला यह स्पष्ट करता है कि कटौती कब और कैसे की जाएगी।

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“कटौती अनुमान के आधार पर नहीं की जा सकती। पहले यह साबित होना चाहिए कि सहायता वास्तव में मिली है,” पीठ ने कहा।

क्या हाईकोर्ट ‘स्पष्टीकरण’ के नाम पर फैसला बदल सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट के पास ‘स्पष्टीकरण’ के नाम पर मूल आदेश में बड़ा बदलाव करने का अधिकार नहीं है।

अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धाराओं 151 और 152 का हवाला देते हुए कहा कि इनका उपयोग केवल टंकण त्रुटि या गणना की गलती सुधारने तक सीमित है।

“स्पष्टीकरण के बहाने मुआवज़े की राशि बदलना, वस्तुतः पुनर्विचार के समान है,” पीठ ने टिप्पणी की।

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सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने बीमा कंपनी की अपील स्वीकार कर ली।

  • हाईकोर्ट का ‘स्पष्टीकरण आदेश’ रद्द कर दिया गया।
  • 18 सितंबर 2019 का मूल आदेश बहाल किया गया।
  • 2006 नियमों के तहत जो राशि परिवार को वेतन के रूप में मिली है, वह मुआवज़े से घटेगी।
  • ट्रिब्यूनल के तय 7.5% ब्याज की दर बरकरार रहेगी।
  • परिवार को हलफनामा देकर बताना होगा कि उन्हें कितनी राशि मिली है, ताकि उसी के अनुसार अंतिम भुगतान तय किया जा सके।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि 2006 नियमों के तहत कोई राशि प्राप्त नहीं हुई है, तो परिवार को पूरी मुआवज़ा राशि मिलेगी।

Case Title: Reliance General Insurance Company Limited v. Kanika & Ors.

Case No.: Civil Appeal Nos. 2506-2507 of 2026 (Arising out of SLP (C) Nos. 26979-80 of 2025)

Case Type: Civil Appeal (Motor Accident Compensation)

Decision Date: 24 February 2026

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