सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में 11 साल पुराने जॉइंट वेंचर विवाद में दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यह विवाद मूल रूप से सिविल प्रकृति का है और इसे आपराधिक रंग देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
मंगलवार को अदालत कक्ष में सुनवाई के दौरान जजों ने साफ कहा कि केवल अनुबंध के उल्लंघन से हर मामला आपराधिक नहीं बन जाता। यह टिप्पणी उस अपील पर आई जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी।
पीठ में न्यायमूर्ति पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा शामिल थे।
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मामले की पृष्ठभूमि
वंदना जैन और अन्य ने वर्ष 2010 में मोटर जनरल सेल्स लिमिटेड के साथ एक जॉइंट वेंचर एग्रीमेंट (JVA) किया था। समझौते के तहत कानपुर स्थित प्लॉट नंबर 61 पर आवासीय परियोजना विकसित की जानी थी।
समझौते के अनुसार, डेवलपर को निर्माण का दायित्व निभाना था और दोनों पक्षों को 50-50 प्रतिशत हिस्सेदारी मिलनी थी। सुरक्षा राशि के रूप में 1 करोड़ रुपये दिए गए थे।
परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। इसके बाद वर्ष 2021 में लखनऊ के हजरतगंज थाने में आईपीसी की धाराओं 406, 420, 467, 468 और 471 के तहत FIR दर्ज कराई गई। आरोप था कि जमीन के स्वामित्व और लंबित मुकदमों की जानकारी छिपाई गई तथा फर्जी दस्तावेज पेश किए गए।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए कहा था कि FIR में अपराध का प्रथम दृष्टया मामला बनता है और जांच होनी चाहिए।
इसके बाद अपील सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
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सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान अदालत ने JVA की धाराओं को विस्तार से पढ़ा। पीठ ने पाया कि समझौते में यह कहीं नहीं लिखा था कि जमीन पर कोई मुकदमा लंबित नहीं है। केवल यह आश्वासन दिया गया था कि कोई अटैचमेंट या अदालत का रोक आदेश नहीं है।
अदालत ने कहा:
“केवल यह कहना कि मुकदमा लंबित था, अपने आप में धोखाधड़ी नहीं बनाता, जब तक कि समझौते में ऐसा स्पष्ट प्रतिनिधित्व न किया गया हो।”
सुरक्षा राशि के मुद्दे पर कोर्ट ने पाया कि वह राशि गैर-वापसी योग्य थी और उसे बिक्री हिस्सेदारी से समायोजित किया जाना था। ऐसे में वापसी न होने से आपराधिक विश्वासघात का मामला नहीं बनता।
फर्जी दस्तावेज के आरोप पर अदालत ने स्पष्ट कहा:
“सिर्फ इसलिए कि कोई पत्र वर्षों बाद कार्यालय में उपलब्ध नहीं है, उसे जाली नहीं कहा जा सकता। जालसाजी साबित करने के लिए आईपीसी की धारा 464 के तत्व पूरे होने चाहिए।”
पीठ ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि समझौता 2010 का था और FIR 2021 में दर्ज हुई। अदालत ने कहा कि यदि शुरुआत से ही धोखाधड़ी का इरादा होता तो शिकायत तुरंत दर्ज होती।
न्यायालय ने कहा:
“यह स्पष्ट रूप से सिविल विवाद है, जिसे आपराधिक मुकदमे का रूप दिया गया है।”
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अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। साथ ही 2021 में दर्ज FIR और उससे संबंधित सभी कार्यवाहियां समाप्त कर दीं।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि FIR में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात या जालसाजी का प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता।
Case Title: Vandana Jain & Ors. v. State of Uttar Pradesh & Ors.
Case No.: Criminal Appeal No. 1127 of 2026 (Arising out of SLP (Crl) No. 6670/2021)
Decision Date: February 25, 2026










