दिल्ली से आई एक अहम टैक्स अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। मामला विदेशी निवेश, टैक्स संधि और तथाकथित “ट्रीटी शॉपिंग” से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साफ कहा कि केवल शक के आधार पर किसी निवेश संरचना को टैक्स बचाने की साजिश नहीं कहा जा सकता।
यह मामला टाइगर ग्लोबल इंटरनेशनल की मॉरिशस स्थित कंपनियों और भारत के Authority for Advance Rulings (AAR) के बीच चला आ रहा था।
मामले की पृष्ठभूमि
टाइगर ग्लोबल की तीन मॉरिशस कंपनियों ने सिंगापुर की एक कंपनी के शेयर बेचे थे, जिसकी असली वैल्यू भारत में मौजूद संपत्तियों से जुड़ी थी। यह सौदा वॉलमार्ट द्वारा फ्लिपकार्ट अधिग्रहण के बड़े वैश्विक ट्रांजैक्शन का हिस्सा था।
भारतीय टैक्स विभाग ने इस पर सवाल उठाया कि क्या इस बिक्री से हुआ कैपिटल गेन भारत में टैक्स के दायरे में आता है। जब मामला AAR के पास गया, तो उसने यह कहकर आवेदन खारिज कर दिया कि पूरा ढांचा टैक्स बचाने के लिए बनाया गया लगता है।
इसके बाद टाइगर ग्लोबल ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट का रुख
दिल्ली हाईकोर्ट ने AAR के आदेश को पलट दिया। कोर्ट ने माना कि:
- टाइगर ग्लोबल की कंपनियां मॉरिशस में कानूनी तौर पर रजिस्टर्ड हैं।
- उनके पास वैध Tax Residency Certificate (TRC) है।
- सिर्फ इस आधार पर कि निवेश का रास्ता मॉरिशस से होकर गया, टैक्स चोरी का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
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हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि 2017 से पहले किए गए निवेश “ग्रैंडफादरिंग” के दायरे में आते हैं, यानी उन पर नए टैक्स नियम लागू नहीं होंगे।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
रेवेन्यू विभाग ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सरकार की ओर से दलील दी गई कि:
- TRC होना ही सब कुछ नहीं है।
- असली नियंत्रण और फैसले कहां से होते हैं, यह देखना जरूरी है।
- अगर पूरा ढांचा सिर्फ टैक्स बचाने के लिए है, तो संधि का फायदा नहीं मिलना चाहिए।
वहीं टाइगर ग्लोबल की ओर से कहा गया कि:
- भारत और मॉरिशस की टैक्स संधि साफ है।
- जब तक धोखाधड़ी या फर्जीवाड़े का ठोस सबूत न हो, निवेशकों को संधि का लाभ मिलना चाहिए।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान बेंच ने संतुलित रुख अपनाया। अदालत ने कहा,
“केवल विदेशी संरचना होना अपने आप में टैक्स बचाने की साजिश नहीं है। ठोस सबूत के बिना निवेश को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।”
कोर्ट ने यह भी माना कि:
- Tax Residency Certificate एक मजबूत दस्तावेज है।
- जब तक यह साबित न हो जाए कि कंपनी सिर्फ नाम की है और असली कामकाज कहीं और से हो रहा है, तब तक संधि का फायदा छीना नहीं जा सकता।
- 2017 से पहले किए गए निवेशों को नए सख्त नियमों से पीछे से लागू नहीं किया जा सकता।
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फैसले का असर
इस फैसले से विदेशी निवेशकों को यह साफ संदेश मिला है कि:
- भारत में निवेश के लिए बनी अंतरराष्ट्रीय संरचनाएं अपने आप में गलत नहीं हैं।
- टैक्स संधियों का सम्मान किया जाएगा, बशर्ते धोखाधड़ी का सबूत न हो।
टैक्स अधिकारियों को भी यह संकेत मिला कि हर मामले में “शक” के आधार पर कड़ी कार्रवाई नहीं की जा सकती।
कोर्ट का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए AAR के आदेश को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ किया कि टाइगर ग्लोबल की मॉरिशस कंपनियों का लेन-देन टैक्स बचाने की साजिश नहीं माना जा सकता और वे भारत–मॉरिशस टैक्स संधि के तहत मिलने वाले लाभ की हकदार हैं।
Case Title: Authority for Advance Rulings vs Tiger Global International Holdings
Case No.: Civil Appeal Nos. 262–264 of 2026
Case Type: Income Tax – Treaty Benefit Dispute
Decision Date: 15 January 2026










