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वैवाहिक तनाव को अपराध नहीं कहा जा सकता: दहेज और क्रूरता केस पर हाईकोर्ट की सख़्त टिप्पणी

अबुजर अहमद और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य - कर्नाटक उच्च न्यायालय ने धारा 498ए और दहेज संबंधी एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि वैवाहिक कलह को आपराधिक कानून के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता।

Shivam Y.
वैवाहिक तनाव को अपराध नहीं कहा जा सकता: दहेज और क्रूरता केस पर हाईकोर्ट की सख़्त टिप्पणी

शादीशुदा ज़िंदगी में तनाव, बहस और मतभेद आम हैं, लेकिन क्या हर वैवाहिक विवाद आपराधिक मुकदमे में बदल जाना चाहिए? इसी अहम सवाल पर कर्नाटक हाई कोर्ट ने सख़्त रुख अपनाते हुए पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि वैवाहिक असहमति को धारा 498A जैसे गंभीर प्रावधानों के तहत अपराध में बदलना क़ानून का दुरुपयोग है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बेंगलुरु के रहने वाले अबूज़र अहमद, उनके माता-पिता और भाई से जुड़ा है। पत्नी ने वर्ष 2024 में बसवंगुडी महिला पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप थे कि शादी के बाद उससे दहेज मांगा गया, मानसिक प्रताड़ना हुई और घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा।

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दंपति की शादी 25 अगस्त 2017 को हुई थी। शादी के तुरंत बाद दोनों अमेरिका चले गए, जहां करीब छह साल तक साथ रहे और इस दौरान उनके दो बच्चे भी हुए। पत्नी जनवरी 2023 में भारत लौटी और लगभग एक साल बाद आपराधिक शिकायत दर्ज कराई।

शिकायत में पत्नी ने आरोप लगाया कि उससे घर के सारे काम करवाए जाते थे, कपड़ों, खानपान और व्यवहार को लेकर ताने दिए जाते थे। सास और पति की ओर से मानसिक दबाव की बातें कही गईं। हालांकि, शिकायत में किसी स्पष्ट दहेज मांग, तारीख़, रकम या ठोस घटना का उल्लेख नहीं था।

यही नहीं, शिकायत के बाद पति के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर भी जारी कर दिया गया, जिससे वह विदेश यात्रा नहीं कर सके।

अदालत की अहम टिप्पणियां

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने की। कोर्ट ने शिकायत को विस्तार से पढ़ने के बाद कहा कि लगाए गए आरोप वैवाहिक असहमति को दर्शाते हैं, न कि वह “क्रूरता” जो धारा 498A के तहत दंडनीय हो।

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अदालत ने टिप्पणी की,

“क़ानून असफल शादियों या आपसी असहजता को अपराध नहीं बनाता। धारा 498A हर वैवाहिक समस्या का समाधान नहीं है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि पति-पत्नी के बीच रोज़मर्रा की नोकझोंक, घरेलू ज़िम्मेदारियों को लेकर असहमति या आपसी नाराज़गी को आपराधिक मुकदमे का रूप देना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

हाई कोर्ट ने इस बात पर भी नाराज़गी जताई कि पुलिस ने बिना किसी प्रारंभिक जांच के सीधे एफआईआर दर्ज कर ली। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा गया कि ऐसे मामलों में सावधानी बरतना ज़रूरी है, ताकि निर्दोष लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए।

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अदालत ने माना कि शिकायत में लगाए गए आरोप इतने गंभीर नहीं थे कि पति या उसके परिवार के खिलाफ आपराधिक जांच जारी रखी जाए।

अदालत का अंतिम फैसला

सभी तथ्यों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने बसवंगुडी महिला पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR संख्या 90/2024 को पूरी तरह रद्द कर दिया। इसके साथ ही पति और उसके माता-पिता व भाई के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी गई।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवादों का समाधान आपराधिक मुकदमों के ज़रिए नहीं, बल्कि उचित कानूनी और पारिवारिक तरीकों से किया जाना चाहिए।

Case Title: Abuzar Ahmed & Ors. v. State of Karnataka & Ors.

Case Number: Criminal Petition No. 7053 of 2024

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