मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

सिर्फ शक के आधार पर जेल नहीं: ड्रग मामलों में निवारक हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

रोशनी देवी बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य - सुप्रीम कोर्ट ने गांजा मामले में तेलंगाना की महिला की निवारक हिरासत को रद्द कर दिया, और फैसला सुनाया कि हिरासत कानून के तहत सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरे का कोई सबूत नहीं है।

Court Book (Admin)
सिर्फ शक के आधार पर जेल नहीं: ड्रग मामलों में निवारक हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में तेलंगाना सरकार द्वारा पारित एक निवारक हिरासत आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि केवल इस आशंका के आधार पर कि आरोपी ज़मानत पर छूटने के बाद फिर अपराध कर सकती है, उसकी स्वतंत्रता छीनी नहीं जा सकती। यह फैसला 8 जनवरी 2026 को सुनाया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला रोशिनी देवी द्वारा दायर अपील से जुड़ा है। रोशिनी ने अपनी मां अरुणा बाई उर्फ अंगूरी बाई की निवारक हिरासत को चुनौती दी थी। अरुणा बाई को 10 मार्च 2025 को हैदराबाद के कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट ने तेलंगाना प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज़ एक्ट, 1986 के तहत हिरासत में लिया था।

Read also:- आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: जन सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन पर जोर, सुनवाई जारी

हिरासत का आधार तीन आपराधिक मामले थे, जिनमें कथित तौर पर गांजा रखने और बेचने के आरोप लगे थे। प्रशासन का कहना था कि आरोपी एक “ड्रग ऑफेंडर” है और उसकी गतिविधियां जन स्वास्थ्य और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा हैं।

हाईकोर्ट का रुख

तेलंगाना हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2025 में हिरासत आदेश को सही ठहराया था। हाईकोर्ट का मानना था कि आरोपी की बार-बार की गई गतिविधियों से आम जनता के स्वास्थ्य को लेकर डर और असुरक्षा का माहौल बनता है। इसलिए हिरासत को उचित माना गया।

सुप्रीम कोर्ट में दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि आरोपी के खिलाफ ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि उसकी गतिविधियों से “सार्वजनिक व्यवस्था” प्रभावित हुई। उन्होंने कहा कि यह अधिकतम “कानून-व्यवस्था” का मामला हो सकता है, न कि सार्वजनिक व्यवस्था का।

वहीं राज्य सरकार ने तर्क दिया कि आरोपी की आपराधिक पृष्ठभूमि और बार-बार दर्ज मामलों को देखते हुए निवारक हिरासत जरूरी थी।

Read also:- सहमति संबंध टूटने के बाद दर्ज एफआईआर पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: विदेश में रह रहे आरोपी को अग्रिम जमानत

अदालत की टिप्पणियां

जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकांत की पीठ ने हिरासत आदेश का बारीकी से परीक्षण किया। अदालत ने कहा कि हिरासत आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि आरोपी की गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था वास्तव में कैसे प्रभावित हुई।

पीठ ने टिप्पणी की,

“केवल यह आशंका कि आरोपी ज़मानत पर छूटने के बाद फिर अपराध करेगी, निवारक हिरासत का आधार नहीं बन सकती।”

अदालत ने यह भी कहा कि यदि आरोपी ने ज़मानत की शर्तों का उल्लंघन किया था, तो राज्य सरकार के पास ज़मानत रद्द कराने जैसे वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद थे।

Read also:- CBFC को झटका: ‘जना नायकन’ पर UA 16+ सर्टिफिकेट रोकना अवैध, मद्रास हाईकोर्ट का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि “कानून-व्यवस्था” और “सार्वजनिक व्यवस्था” में स्पष्ट अंतर है। हर अपराध सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित नहीं करता। जब तक यह न दिखाया जाए कि आरोपी की गतिविधियों से व्यापक जनजीवन, सुरक्षा या स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ा है, तब तक निवारक हिरासत उचित नहीं ठहराई जा सकती।

अंतिम निर्णय

इन सभी कारणों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 10 मार्च 2025 का हिरासत आदेश रद्द कर दिया। साथ ही, तेलंगाना हाईकोर्ट का 28 अक्टूबर 2025 का फैसला भी निरस्त कर दिया गया।

अदालत ने आदेश दिया कि आरोपी को तुरंत रिहा किया जाए, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।

Case Title: Roshini Devi vs The State of Telangana & Others

More Stories