राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने एक अहम फैसले में हत्या के मामले में सुनाई गई उम्रकैद की सजा को पलट दिया। अदालत ने कहा कि पूरे मामले की बुनियाद एक डाइंग डिक्लेरेशन (मरणोपरांत बयान) पर टिकी थी, लेकिन उसे दर्ज करने की प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं। ऐसे में आरोपी को दोषी ठहराना सुरक्षित नहीं माना जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 14 सितंबर 2015 का है। उदयपुर जिले के सलूम्बर अस्पताल में कंकू देवी को करीब 90% जली हुई हालत में भर्ती कराया गया था। आरोप था कि उनके पति सोमा ने शराब के लिए पैसे मांगने पर मना करने से नाराज़ होकर उन पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी।
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उसी दिन पुलिस ने उनका बयान दर्ज किया। बाद में उपचार के दौरान कंकू देवी की मृत्यु हो गई और मामला धारा 307 से बढ़ाकर भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) में बदल दिया गया। ट्रायल कोर्ट ने 6 जून 2018 को सोमा को दोषी मानते हुए उम्रकैद और 25,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
इस फैसले के खिलाफ सोमा ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
अदालत के समक्ष प्रमुख सवाल
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पूरे रिकॉर्ड की दोबारा जांच की। मुख्य सवाल यह था कि क्या डाइंग डिक्लेरेशन भरोसेमंद है और क्या उसे ही सजा का आधार बनाया जा सकता है।
अदालत ने पाया कि जिस एएसआई ने बयान दर्ज किया, उसने डॉक्टर से लिखित रूप में यह प्रमाण नहीं लिया कि पीड़िता बयान देने की मानसिक और शारीरिक स्थिति में थी। डॉक्टर ने भी अदालत में स्वीकार किया कि उन्होंने कोई लिखित प्रमाणन नहीं दिया।
पीठ ने टिप्पणी की, “डाइंग डिक्लेरेशन तभी स्वीकार्य है जब यह स्वेच्छा से, स्पष्ट रूप से और पूर्ण मानसिक स्थिति में दिया गया हो। यहां ऐसी प्रक्रिया का अभाव है।”
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गवाहों के बयान में विरोधाभास
पीड़िता के पिता और अन्य रिश्तेदारों ने दावा किया कि उन्होंने सलूम्बर अस्पताल में पीड़िता से बातचीत की थी। लेकिन जांच अधिकारी के बयान और पंचनामा दस्तावेज से यह संकेत मिला कि वे सीधे उदयपुर के बर्न वार्ड पहुंचे थे।
अदालत ने कहा कि यह विरोधाभास “मूल प्रश्न” पर असर डालता है और कथित मौखिक डाइंग डिक्लेरेशन की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।
इसके अलावा, एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि आरोपी के हाथों पर भी जलने के निशान थे। मेडिकल गवाह ने माना कि ऐसे निशान किसी को बचाने की कोशिश में भी आ सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Manjunath v. State of Karnataka (2023) का उल्लेख किया। उस फैसले में कहा गया था कि यदि डाइंग डिक्लेरेशन की रिकॉर्डिंग प्रक्रिया में संदेह हो, तो उस पर आधारित दोषसिद्धि सुरक्षित नहीं मानी जा सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में भी वही स्थिति है-बयान लिखने वाले की पहचान स्पष्ट नहीं, फिटनेस का प्रमाण नहीं, और मजिस्ट्रेट को नहीं बुलाया गया, जबकि उनका कार्यालय अस्पताल से महज 500 फीट दूर था।
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पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण “बर्न शॉक” बताया गया। लेकिन मेडिकल बोर्ड के सदस्य ने जिरह में स्वीकार किया कि 90% तक जलने की चोटें दुर्घटनावश भी हो सकती हैं।
अदालत ने कहा कि सिर्फ इस आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मृत्यु निश्चित रूप से हत्या थी।
अंतिम निर्णय
सभी तथ्यों और साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपराध सिद्ध नहीं कर पाया।
पीठ ने कहा, “जहां अभियोजन का मामला गंभीर शंकाओं से घिरा हो, वहां आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए।”
अंततः अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और आरोपी सोमा को हत्या के आरोप से बरी कर दिया।
Case Title: Soma v. State of Rajasthan
Case No.: D.B. Criminal Appeal No. 181/2018
Decision Date: 06 February 2026










