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38 साल बाद भी डकैती केस में बरी रहेंगे आरोपी: कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य की अपील खारिज की

पश्चिम बंगाल राज्य बनाम देबब्रत @ बापी गोस्वामी और अन्य। कलकत्ता हाईकोर्ट ने 1982 के डकैती मामले में राज्य की अपील खारिज की। साक्ष्य की कमी और पहचान में खामी के कारण आरोपी बरी।

Vivek G.
38 साल बाद भी डकैती केस में बरी रहेंगे आरोपी: कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य की अपील खारिज की

करीब चार दशक पुराने डकैती मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों को बरी करने का फैसला तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर उचित था, और उसमें हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। यह फैसला न्यायमूर्ति अनन्या बंद्योपाध्याय की एकल पीठ ने सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

घटना 31 जुलाई 1982 की शाम की है। शिकायतकर्ता सुकुमार सरकार, जो बेगुनकोदर स्थित एक कार्यालय में जूनियर अकाउंटेंट थे, अपने क्वार्टर में पत्नी और दो परिचितों के साथ बैठे थे। तभी चार लोग हथियारों के साथ कमरे में घुसे। आरोप है कि बदमाशों ने हथियार दिखाकर सोने के आभूषण, 858 रुपये नकद और एक कलाई घड़ी लूट ली।

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मामले में पुलिस ने जांच के बाद भारतीय दंड संहिता की धारा 395 (डकैती) और 412 (डकैती की संपत्ति रखने) के तहत आरोपपत्र दायर किया। लेकिन 31 मार्च 1988 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, पुरुलिया ने साक्ष्यों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

राज्य सरकार ने इसी फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी।

ट्रायल के दौरान क्या हुआ

ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने 12 गवाह पेश किए। इनमें शिकायतकर्ता, उनकी पत्नी और पड़ोसी शामिल थे। एक गवाह ने दावा किया कि लूटी गई कलाई घड़ी बाद में बरामद हुई और उसने पहचान परेड में उसे पहचान लिया।

हालांकि, दो स्वतंत्र जब्ती गवाहों ने अदालत में पुलिस की कार्रवाई का समर्थन नहीं किया। उन्हें शत्रुतापूर्ण (hostile) घोषित किया गया।

साथ ही, अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि बरामद कलाई घड़ी वास्तव में पीड़ित की ही थी। अदालत ने यह भी नोट किया कि घड़ी का नंबर या अन्य पहचान संबंधी विवरण शुरू में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किया गया था।

अदालत की मुख्य टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने कहा कि पहचान को लेकर गंभीर संदेह है। शिकायतकर्ता और अन्य प्रत्यक्षदर्शी अदालत में किसी भी आरोपी की पहचान नहीं कर सके।

पीठ ने कहा, “पहचान की प्रक्रिया और बरामदगी दोनों में ऐसी कमियां हैं, जिनसे अभियोजन की कहानी पर भरोसा करना कठिन हो जाता है।”

अदालत ने यह भी पाया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत आरोपियों का कथित बयान कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं था, क्योंकि वह केवल स्वीकारोक्ति जैसा प्रतीत होता है और उससे ठोस बरामदगी साबित नहीं हुई।

न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट की उस टिप्पणी से सहमति जताई कि जांच एजेंसी चोरी गई घड़ी का स्वामित्व पुख्ता तरीके से सिद्ध करने में विफल रही।

देरी और साक्ष्य की कमजोरी

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि घटना के कई महीने बाद बयान दर्ज किए गए। इससे गवाहों की याददाश्त पर सवाल खड़े हुए।

फैसले में कहा गया कि इतने लंबे समय के बाद साक्ष्यों में मौजूद खामियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पीठ ने स्पष्ट कहा, “जब अभियोजन की कहानी में गंभीर विरोधाभास हों और पहचान व बरामदगी संदेह से परे साबित न हो, तो केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं दी जा सकती।”

अंतिम निर्णय

इन सभी तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सही था और उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

अदालत ने राज्य की अपील खारिज कर दी और कहा कि 38 वर्ष बाद मामले को दोबारा पलटना न्यायसंगत नहीं होगा।

इसके साथ ही GA 19 of 1988 अपील निरस्त कर दी गई।

Case Title: The State of West Bengal vs Debabrata @ Bapi Goswami & Ors.

Case No.: GA 19 of 1988

Decision Date: 24 February 2026

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