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इलाहाबाद हाईकोर्ट: उत्तर प्रदेश में गोद लेने का दस्तावेज़ पंजीकृत होना अनिवार्य, नोटरीकृत डीड 1977 संशोधन के बाद अमान्य घोषित

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा-1977 के बाद उत्तर प्रदेश में केवल पंजीकृत गोद लेने की डीड ही वैध, नोटरीकृत दस्तावेज़ अमान्य।

Vivek G.
इलाहाबाद हाईकोर्ट: उत्तर प्रदेश में गोद लेने का दस्तावेज़ पंजीकृत होना अनिवार्य, नोटरीकृत डीड 1977 संशोधन के बाद अमान्य घोषित

हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने दो व्यक्तियों द्वारा दायर उस विशेष अपील को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने एक अपंजीकृत गोद लेने के दस्तावेज़ के आधार पर अभिभावकत्व का दावा किया था। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश में 1976 के संशोधन के बाद केवल पंजीकृत गोद लेने के दस्तावेज़ को ही वैध माना जाएगा।

पृष्ठभूमि

मामला अरुण एवं अन्य बनाम राज्य बनाम उत्तर प्रदेश एवं अन्य से जुड़ा था, जो नाबालिग लड़की आयशा की अभिरक्षा के विवाद से संबंधित था। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि उन्होंने एक नोटरीकृत गोद लेने के दस्तावेज़ के माध्यम से बच्ची को गोद लिया है। एकल न्यायाधीश ने पहले ही इस दावे को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि दस्तावेज़ कानून के अनुसार पंजीकृत नहीं है, इसलिए वह अमान्य है।

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अपीलकर्ताओं ने इस आदेश को चुनौती देते हुए 2014 के एक फैसले (संजय कुमार बनाम राज्य उत्तर प्रदेश) पर भरोसा किया और तर्क दिया कि यदि अन्य सबूत मौजूद हों तो अपंजीकृत गोद लेने का दस्तावेज़ भी स्वीकार्य होना चाहिए।

अदालत के अवलोकन

पीठ ने हिंदू गोद और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA) की धारा 16 और उत्तर प्रदेश संशोधन (1976 के सिविल लॉ रिफॉर्म एंड अमेंडमेंट एक्ट) का गहराई से परीक्षण किया। न्यायाधीशों ने कहा कि 1 जनवरी 1977 से प्रभावी संशोधन के बाद उत्तर प्रदेश में कोई भी अदालत तब तक गोद लेने का प्रमाण स्वीकार नहीं कर सकती जब तक कि वह पंजीकृत दस्तावेज़ से प्रमाणित न हो।

संशोधित कानून का हवाला देते हुए पीठ ने कहा-

“उत्तर प्रदेश में कोई भी न्यायालय गोद देने और लेने के साक्ष्य को तब तक स्वीकार नहीं करेगा जब तक वह किसी विधि के अंतर्गत पंजीकृत दस्तावेज़ द्वारा प्रमाणित न हो।”

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न्यायमूर्ति राजन रॉय ने कहा कि यह संशोधन जानबूझकर लाया गया था ताकि फर्जी और काल्पनिक गोद लेने के दावों पर रोक लगाई जा सके। उन्होंने यह भी जोड़ा कि केवल मौखिक या नोटरीकृत दस्तावेज़ों के आधार पर दावे आसानी से गढ़े जा सकते हैं, जिससे संपत्ति या अभिभावकत्व के अधिकारों का दुरुपयोग होता है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि द्वितीयक साक्ष्य (secondary evidence) केवल तभी स्वीकार्य है जब कोई पंजीकृत गोद लेने का दस्तावेज़ पहले से मौजूद हो और अब अनुपलब्ध हो। पीठ ने कहा- “इस मामले में तो शुरू से ही कोई पंजीकृत दस्तावेज़ नहीं था, इसलिए यह प्रावधान लागू नहीं हो सकता।”

निर्णय

सभी कानूनी पहलुओं और पूर्व निर्णयों की समीक्षा के बाद अदालत ने पाया कि एकल न्यायाधीश के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है। पीठ ने कहा-

“क्योंकि कथित गोद लेने का दस्तावेज़ केवल नोटरीकृत है और विधि के अनुसार पंजीकृत नहीं है, इसलिए अपीलकर्ताओं को इसका कोई लाभ नहीं मिल सकता।”

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इस प्रकार, खंडपीठ ने अपील को अस्वीकार करते हुए यह दोहराया कि 1 जनवरी 1977 के बाद उत्तर प्रदेश में गोद लेना तभी मान्य होगा जब उसका पंजीकृत दस्तावेज़ हो।

यह फैसला 19 सितंबर 2025 को सुनाया गया और यह स्पष्ट संकेत देता है कि केवल नोटरीकरण (Notarization) पंजीकरण (Registration) के समान नहीं है।

Case Title: Arun & Another v. State of Uttar Pradesh & Others

Case Type: Special Appeal No. 316 of 2025

Date of Judgment: September 19, 2025

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