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CRPF सुरक्षा की मांग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, कहा– 'VIP कल्चर' नहीं बनेगा कानून का आधार

विकास चौधरी और अन्य बनाम भारत संघ और 4 अन्य, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने CRPF सुरक्षा की मांग खारिज की, कहा- खतरे का आकलन प्रशासन का काम, VIP संस्कृति को बढ़ावा नहीं।

Vivek G.
CRPF सुरक्षा की मांग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, कहा– 'VIP कल्चर' नहीं बनेगा कानून का आधार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की कोर्ट नंबर 40 में बुधवार को एक ऐसी याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें दो याचिकाकर्ताओं ने अपनी जान को खतरा बताते हुए केंद्र सरकार से सशस्त्र केंद्रीय सुरक्षा बल (CRPF) की सुरक्षा मांगी थी। अदालत ने सुनवाई के बाद साफ शब्दों में कहा कि सुरक्षा का आकलन अदालत का नहीं, बल्कि सक्षम प्राधिकरण का काम है। अंततः याचिका खारिज कर दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला Vikas Chaudhary And Another vs Union of India and 4 Others से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि उन्होंने तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज कराई थीं।

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पहली एफआईआर वर्ष 2020 की थी, जिसमें उनके ईंट-भट्टे की बाउंड्री वॉल और लेबर क्वार्टर तोड़ने का आरोप लगाया गया। दूसरी एफआईआर कथित फर्जी ट्रस्ट डीड से संबंधित बताई गई। तीसरी शिकायत 2023 में मोबाइल फोन हैकिंग को लेकर दर्ज कराई गई।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इन घटनाओं के कारण उनकी जान को गंभीर और लगातार खतरा बना हुआ है। इसलिए उन्हें तत्काल CRPF सुरक्षा प्रदान की जाए।

अदालत की प्रारंभिक टिप्पणी

सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिका और उसके साथ लगाए गए दस्तावेजों का अवलोकन किया। अदालत ने पाया कि याचिका में ऐसा कोई ठोस या विशिष्ट उदाहरण नहीं दिया गया है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि याचिकाकर्ताओं को वास्तविक और तात्कालिक जान का खतरा है।

अदालत ने यह भी नोट किया कि जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई, उनके अलावा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा जान से मारने की धमकी दिए जाने का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

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महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि 6 अगस्त 2023 के आदेश के तहत याचिकाकर्ताओं को पहले ही एक सुरक्षा गार्ड उपलब्ध कराया जा चुका है। यानी सक्षम प्राधिकरण ने खतरे के आकलन के बाद सुरक्षा दी हुई है।

कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ

पीठ ने कहा कि सुरक्षा का मुद्दा तथ्यात्मक आकलन का विषय है। अदालत ने स्पष्ट किया, “खतरे की प्रकृति और उसकी गंभीरता का मूल्यांकन संबंधित प्राधिकरणों द्वारा किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 226 के तहत यह अदालत स्वयं उस आकलन का स्थानापन्न नहीं बन सकती।”

अदालत ने यह भी कहा कि सुरक्षा व्यवस्था को “स्टेटस सिंबल” में बदलना उचित नहीं है। न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य करदाताओं के पैसों से किसी विशेष वर्ग को विशेषाधिकार नहीं दे सकता।

पीठ ने संविधान की प्रस्तावना का हवाला देते हुए कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहां समानता और न्याय मूल सिद्धांत हैं। ऐसे में राज्य द्वारा एक “विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग” बनाना संवैधानिक मूल्यों के विपरीत होगा।

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सुप्रीम कोर्ट और अन्य फैसलों का संदर्भ

अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Ramveer Upadhyay vs R.M. Srivastava (2015) का उल्लेख किया। उस मामले में भी कहा गया था कि ‘Z’ या ‘Y’ श्रेणी की सुरक्षा का निर्णय अदालत नहीं, बल्कि संबंधित एजेंसियों को करना चाहिए।

साथ ही हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया कि व्यक्तिगत दुश्मनी या सामान्य आशंका के आधार पर राज्य खर्च पर सुरक्षा देना उचित नहीं है।

एक पूर्व फैसले का जिक्र करते हुए अदालत ने टिप्पणी की, “सुरक्षा करदाताओं के पैसे से किसी की प्रतिष्ठा दिखाने का माध्यम नहीं बन सकती।”

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अदालत का अंतिम निर्णय

सभी तथ्यों और पूर्व निर्णयों पर विचार करने के बाद पीठ ने माना कि:

  • याचिकाकर्ताओं को पहले से सुरक्षा प्रदान की जा चुकी है।
  • खतरे का आकलन सक्षम प्राधिकरण द्वारा किया गया है।
  • याचिकाकर्ताओं का न तो कोई वैधानिक और न ही मौलिक अधिकार है कि वे विशेष श्रेणी की पुलिस सुरक्षा की मांग करें।

अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत पुलिस सुरक्षा की मांग सामान्यतः लागू नहीं कराई जा सकती।

इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। आदेश में लागत (कॉस्ट) का कोई निर्देश नहीं दिया गया।

Case Title: Vikas Chaudhary And Another vs Union of India and 4 Others

Case No.: WRIT - C No. 41622 of 2025

Decision Date: February 5, 2026

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