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कूलिंग-ऑफ अवधि पर परिवार अदालत की सख्ती पर गुजरात हाईकोर्ट की दखल, आपसी तलाक याचिका फिर से सुनवाई के लिए बहाल

पति-पत्नी बनाम एनए - गुजरात उच्च न्यायालय ने आपसी सहमति से तलाक के मामले को बहाल किया, कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत छह महीने की शीतलन अवधि को उचित मामलों में माफ किया जा सकता है।

Shivam Y.
कूलिंग-ऑफ अवधि पर परिवार अदालत की सख्ती पर गुजरात हाईकोर्ट की दखल, आपसी तलाक याचिका फिर से सुनवाई के लिए बहाल

अहमदाबाद स्थित गुजरात हाईकोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक (म्यूचुअल डिवोर्स) के एक मामले में अहम हस्तक्षेप करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें केवल कूलिंग-ऑफ अवधि के आधार पर याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में प्रक्रिया को यांत्रिक ढंग से नहीं अपनाया जाना चाहिए, बल्कि पक्षकारों को आवश्यक अवसर दिया जाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक दंपति से जुड़ा है, जिनका विवाह 9 दिसंबर 2023 को हुआ था। शादी के कुछ ही समय बाद, 17 जनवरी 2024 से पति-पत्नी अलग-अलग रहने लगे। पत्नी अहमदाबाद में रहकर अपना करियर आगे बढ़ाना चाहती हैं, जबकि पति उच्च शिक्षा के बाद यूनाइटेड किंगडम में बसने की तैयारी में हैं।

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दोनों ने यह स्वीकार किया कि साथ रहने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में, 1 अप्रैल 2025 को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13B के तहत आपसी सहमति से तलाक की याचिका फैमिली कोर्ट, अहमदाबाद में दाखिल की गई।

फैमिली कोर्ट का आदेश

फैमिली कोर्ट ने 8 अगस्त 2025 को याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि छह महीने की कूलिंग-ऑफ अवधि कोई औपचारिकता नहीं है और इसके लिए अलग से छूट (वेवर) की अर्जी दाखिल नहीं की गई थी। अदालत ने यह भी माना कि बिना वेवर आवेदन के दूसरी मोशन पर विचार नहीं किया जा सकता।

अपील में दोनों पक्षों के वकीलों ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट को याचिका खारिज करने के बजाय या तो पक्षकारों को वेवर आवेदन दाखिल करने का अवसर देना चाहिए था या सुनवाई आगे बढ़ाई जानी चाहिए थी।

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उन्होंने यह भी कहा कि पति-पत्नी दोनों स्वतंत्र इच्छा से तलाक चाहते हैं, भरण-पोषण और भविष्य के दावों को लेकर समझौता हो चुका है और ऐसे में प्रक्रिया में कठोरता केवल मानसिक पीड़ा को बढ़ाएगी।

अदालत की टिप्पणियां

खंडपीठ न्यायमूर्ति संगीता के. विशेन और न्यायमूर्ति निशा एम. ठाकोर ने सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि धारा 13B(2) के तहत छह महीने की अवधि अनिवार्य नहीं बल्कि निर्देशात्मक है। अदालत ने कहा कि जब विवाह पूरी तरह टूट चुका हो और सुलह की कोई संभावना न हो, तो कूलिंग-ऑफ अवधि को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जाना चाहिए।

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पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा,

“जब दोनों पक्ष एक वर्ष से अधिक समय से अलग रह रहे हों और पुनर्मिलन की कोई संभावना न हो, तो प्रक्रिया का कठोर पालन केवल पीड़ा को लंबा करेगा।”

अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए फैमिली सूट संख्या 1054/2025 को उसके मूल रिकॉर्ड पर बहाल कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि पक्षकार दो सप्ताह के भीतर कूलिंग-ऑफ अवधि से छूट के लिए आवेदन दाखिल करें और फैमिली कोर्ट उस आवेदन पर कानून के अनुसार, स्वतंत्र रूप से निर्णय ले।

इसके साथ ही प्रथम अपील को स्वीकार कर लिया गया और किसी प्रकार की लागत नहीं लगाई गई।

Case Title:- Husband and Wife v. NA

Case Number: R/First Appeal No. 4404 of 2025

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