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दिल्ली हाईकोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण घटाया: ₹30,000 से ₹25,000; पिता “जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते”

दिल्ली हाईकोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण ₹30,000 से घटाकर ₹25,000 किया; पिता द्वारा आय छुपाने के संकेत, बच्चों की साझा जिम्मेदारी पर जोर.

Shivam Y.
दिल्ली हाईकोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण घटाया: ₹30,000 से ₹25,000; पिता “जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते”

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में तीन नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण के लिए पति को दिए गए ₹30,000 प्रतिमाह के निर्देश में आंशिक संशोधन करते हुए राशि घटाकर ₹25,000 प्रति माह कर दी है। न्यायमूर्ति डॉ. स्वराणा कांत शर्मा ने स्पष्ट कहा कि माँ की आय होने से पिता की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।

मामले की पृष्ठभूमि

2014 में हुई शादी से दंपति को तीन बच्चे हुए – 11, 7 और 5 वर्ष के। पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम (PWDV Act) के तहत कार्यवाही शुरू की और मजिस्ट्रेट कोर्ट ने ₹30,000 प्रतिमाह भरण-पोषण तय किया। बाद में सत्र न्यायालय ने भी इस आदेश को सही माना। इसके विरुद्ध पति ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की।

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पति का तर्क था कि वह एक फ़ार्मेसी में काम कर रहा है और उसकी मासिक आय केवल ₹9,000 है, जबकि पत्नी हर माह लगभग ₹34,000 कमाती हैं।

दोनों पक्षों की दलीलें

पति का पक्ष:

  • आय मात्र ₹9,000 होने के कारण ₹30,000 देना असंभव।
  • पत्नी की आय अधिक, इसलिए योगदान अधिक होना चाहिए।
  • माता-पिता ने “दबार” कर दिया, इसलिए साथ नहीं रहते।

पत्नी का पक्ष:

  • वह अपने लिए नहीं, सिर्फ बच्चों के लिए राशि चाहती हैं।
  • पति की आय वास्तविकता से अधिक है, जिसे वह छुपा रहे हैं।
  • माँ को नौकरी, घर, बच्चों की पढ़ाई-देखभाल दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है।

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कोर्ट की टिप्पणी

न्यायालय ने रिकॉर्ड और ITR देखने के बाद माना कि पति की घोषित आय और वास्तविक वित्तीय स्थिति में विरोधाभास है। उन्होंने MBA और फ़ार्मेसी डिप्लोमा होने के बावजूद ₹9,000 आय बताई, जबकि पहले की आयकर रिटर्न में ₹40,000-₹45,000 प्रतिमाह तक की आय दिखती है।

कोर्ट ने कहा:

“एक सक्षम पुरुष केवल ₹9,000 आय दिखाकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। वह अपनी वास्तविक आय छुपा नहीं सकता और बच्चों के खर्च से पीछे नहीं हट सकता।”

एक और अवलोकन में न्यायालय ने लिखा:

“भरण-पोषण दया या उपकार नहीं, बल्कि साझा अभिभावकीय दायित्व की मान्यता है। बच्चे का अधिकार है कि दोनों माता-पिता उसका साथ दें।”

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अंतिम फैसला

  • भरण-पोषण राशि: ₹30,000 → ₹25,000 प्रति माह
  • लागू तिथि: याचिका दाखिल करने की तारीख से
  • कारण: दोनों की आय को यथार्थवादी तरीके से आकलित कर साझा दायित्व तय किया गया

न्यायालय ने कहा कि माँ की नौकरी और कमाई यह नहीं दर्शाती कि वह अकेले ही पूरा बोझ उठाए; पिता का कर्तव्य “अविभाज्य और अनिवार्य” है। यह आदेश केवल अंतरिम भरण-पोषण तक सीमित रहेगा और अंतिम ट्रायल पर प्रभाव नहीं डालेगा।

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