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दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्कूल उप-प्रिंसिपल उत्पीड़न मामले में आरोपों को आंशिक रूप से बहाल किया, एक आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने का आदेश दिया

शशि बाला बनाम राज्य सरकार। दिल्ली के एनसीटी और अन्य। - दिल्ली उच्च न्यायालय ने उप-प्रिंसिपल उत्पीड़न मामले में आरोपों को आंशिक रूप से बहाल किया, एक आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 509 के तहत मुकदमा चलाने का निर्देश दिया।

Shivam Y.
दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्कूल उप-प्रिंसिपल उत्पीड़न मामले में आरोपों को आंशिक रूप से बहाल किया, एक आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने का आदेश दिया

दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसला सुनाया जिसमें एक स्कूल की वाइस-प्रिंसिपल से जुड़े उत्पीड़न के मामले पर विचार किया गया। जस्टिस स्वरना कांत शर्मा ने निचली अदालतों के आदेश में आंशिक बदलाव करते हुए कहा कि आरोपियों में से एक पर

पृष्ठभूमि

मामला जुलाई 2013 का है जब शशि बाला, जो उस समय दिल्ली के एक स्कूल की वाइस-प्रिंसिपल थीं, ने प्रिंसिपल और तीन शिक्षकों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रिंसिपल ने गाली-गलौज की, उन पर हाथ उठाने की कोशिश की और बाकी तीन शिक्षकों ने भी अश्लील इशारे और टिप्पणियों से उनका अपमान किया।

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हालांकि, उनकी शुरुआती लिखित शिकायतों में सभी आरोपियों के नाम नहीं थे। बाद में दर्ज बयानों में उन्होंने विशेष रूप से कहा कि शिक्षक हरि किशन, आनंद कुमार और राजेंद्र कुमार ने उन्हें गालियां दीं और अपमानित किया। इसी देरी और विरोधाभास के आधार पर मजिस्ट्रेट और बाद में सेशन कोर्ट ने तीनों शिक्षकों को बरी कर दिया, जबकि प्रिंसिपल पर आरोप जारी रहे।

अदालत की टिप्पणियां

जस्टिस शर्मा ने 5 जुलाई से 21 जुलाई 2013 के बीच दर्ज की गई कई शिकायतों की जांच की। उन्होंने पाया कि पहली शिकायत में केवल प्रिंसिपल का नाम था जबकि बाद की शिकायतों में अन्य शिक्षकों का जिक्र हुआ।

यह तथ्य कि 2 से 4 नंबर प्रतिवादियों के नाम घटना के अगले ही दिन दर्ज शिकायत में आए, पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता," अदालत ने टिप्पणी की। साथ ही, अदालत ने कहा कि सामान्य गाली-गलौज और ऐसे शब्दों में फर्क करना जरूरी है जो सीधे महिला की गरिमा को चोट पहुँचाते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए जज ने समझाया कि धारा 509 तभी लागू होती है जब महिला की मर्यादा का अपमान करने का इरादा हो और आम तौर पर यह यौन आशय वाले शब्दों या इशारों से जुड़ा होता है। केवल गाली या नौकरी से जुड़ी धमकी अपने आप इस धारा के अंतर्गत नहीं आती।

निर्णय

इसी सिद्धांत को लागू करते हुए हाई कोर्ट ने आरोपियों के बीच फर्क किया। आनंद कुमार और राजेंद्र कुमार पर लगाए गए आरोप - जैसे शिकायतकर्ता को "साली" कहना या प्रमोशन रोकने की धमकी देना धारा 509 के दायरे में अपर्याप्त पाए गए। जज ने कहा कि ये अपमानजनक शब्द जरूर हैं, लेकिन इनमें "यौन आशय या संकेतक तत्व की कमी है।"

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लेकिन हरि किशन के खिलाफ आरोप अलग थे। शिकायतकर्ता ने कहा कि उन्होंने उन्हें "R@n_i" कहा। अदालत ने माना कि यह शब्द सीधा यौन अपमान है और महिला की गरिमा पर हमला करता है।

"ऐसा शब्द, जब बोला जाए, तो महिला को अपमानित करने और दूसरों की नजर में उसकी स्थिति गिराने के लिए ही होता है," जस्टिस शर्मा ने कहा।

इसलिए, अदालत ने आदेश दिया कि हरि किशन पर धारा 509 आईपीसी के तहत मुकदमा चलेगा, जबकि आनंद कुमार और राजेंद्र कुमार की बरी होने की स्थिति बरकरार रहेगी।

इसके साथ ही हाई कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर मामले को आगे की कार्रवाई के लिए ट्रायल कोर्ट को भेज दिया।

केस का शीर्षक: शशि बाला बनाम राज्य सरकार। दिल्ली के एनसीटी और अन्य।

केस नंबर: सीआरएल.एम.सी. 1162/2019

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