बेंगलुरु स्थित कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में साफ कर दिया कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित रूप में “गिरफ्तारी के आधार” (grounds of arrest) न देना गंभीर कानूनी चूक है। इसी आधार पर कोर्ट ने हत्या के मामले में आरोपी को रिहा करने का निर्देश दिया, हालांकि अभियोजन को दोबारा विधि अनुसार कार्रवाई की छूट भी दी।
यह आदेश शिवराज शिवशंकर अमरन्नावर ने 10 फरवरी 2026 को पारित किया। मामला नंजुंडा नामक आरोपी की जमानत याचिका से जुड़ा था।
Read also:- पुराने आपराधिक मामले के बावजूद नौकरी का हक: गुजरात HC ने भर्ती रोके जाने का आदेश किया रद्द
मामले की पृष्ठभूमि
राज्य की ओर से दर्ज अपराध के अनुसार, मृतक लक्कप्पा और आरोपी नंबर 1 के बीच पुराना विवाद था। आरोप है कि 4 अप्रैल 2025 की रात गांव में हुए झगड़े के दौरान आरोपी नंबर 2 (याचिकाकर्ता) ने चाकू से मृतक की पसलियों पर वार किया। इसके बाद आरोपी नंबर 1 ने भी चाकू से हमला किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण फेफड़े और सीने में गहरे घाव से हुआ अत्यधिक रक्तस्राव बताया गया।
घटना के नौ प्रत्यक्षदर्शी बताए गए, जिनमें दो लोग घायल भी हुए। आरोप भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 103(1) सहित अन्य गंभीर धाराओं के तहत लगाए गए, जिनमें आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक का प्रावधान है।
Read also:- मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटी को ज़हर देने का मामला: मद्रास हाईकोर्ट ने माता-पिता की उम्रकैद बरकरार रखी
बचाव पक्ष की दलील
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में जोर देकर कहा कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित रूप में “ग्राउंड्स ऑफ अरेस्ट” नहीं दिए गए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “सिर्फ गिरफ्तारी के सामान्य कारण (reasons for arrest) बताना पर्याप्त नहीं है।”
वकील ने कहा, “गिरफ्तारी के आधार व्यक्तिगत और विशिष्ट होने चाहिए, ताकि आरोपी खुद का बचाव कर सके।”
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए दलील दी कि लिखित आधार न देना संविधान के अनुच्छेद 22(1) और कानून की प्रक्रिया का उल्लंघन है।
राज्य का पक्ष
सरकार की ओर से पेश हाईकोर्ट सरकारी वकील ने कहा कि गिरफ्तारी की सूचना आरोपी की बहन को दी गई थी और गिरफ्तारी मेमो में कारणों का उल्लेख था।
उन्होंने तर्क दिया कि “आरोपी को पता था कि उसे किस अपराध में गिरफ्तार किया गया है।”
राज्य ने यह भी कहा कि मामला गंभीर है, कई चश्मदीद गवाह हैं और आरोपी को रिहा करने से गवाहों को खतरा हो सकता है।
Read also:- चाइनीज मांझा पर सख्त हुई इलाहाबाद हाईकोर्ट, राज्य से पूछा- आदेश क्यों नहीं हो रहे लागू?
कोर्ट की अहम टिप्पणी
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड मंगवाकर जांच की। रिकॉर्ड देखने के बाद न्यायमूर्ति ने स्पष्ट कहा कि आरोपी को लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार नहीं दिए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि “गिरफ्तारी के कारण और गिरफ्तारी के आधार में स्पष्ट अंतर है। आधार वह तथ्य हैं जो आरोपी को अपने बचाव का मौका देते हैं।”
कोर्ट ने यह भी दोहराया कि लिखित आधार दो घंटे के भीतर और मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी से पहले दिए जाने चाहिए। ऐसा न होने पर गिरफ्तारी गैरकानूनी मानी जाएगी।
न्यायालय ने कहा, “इस मामले में जांच अधिकारी ने वैधानिक प्रावधानों का पालन नहीं किया, इसलिए गिरफ्तारी अवैध हो जाती है।”
Read also:- 16 साल बाद झटका पलटा: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने बहाल किया खारिज वसूली मुकदमा, देरी माफ
अदालत का निर्णय
कोर्ट ने आदेश में कहा:
- याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की जाती है।
- आरोपी नंबर 2 को तत्काल रिहा किया जाए।
- हालांकि, अभियोजन पक्ष यदि चाहे तो लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार देने के बाद पुनः रिमांड या हिरासत की मांग कर सकता है।
- संबंधित सर्किल पुलिस इंस्पेक्टर द्वारा कानून का पालन न करने पर आदेश की प्रति हासन के पुलिस अधीक्षक को भेजी जाए।
इस प्रकार, गंभीर आरोपों के बावजूद, कोर्ट ने प्रक्रिया की अनदेखी को निर्णायक माना और आरोपी को रिहा करने का आदेश दिया।
Case Title: Nanjunda vs State of Karnataka
Case No.: Criminal Petition No. 16200/2025
Decision Date: 10 February 2026









