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NDPS Act: सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला - दीर्घ कारावास के आधार पर जमानत संभव

सुप्रीम कोर्ट ने NDPS अधिनियम की धारा 37 की कठोरता के बावजूद दीर्घकालिक कारावास को जमानत का आधार माना। जानिए पूरा निर्णय और इसके प्रभाव।

Shivam Y.
NDPS Act: सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला - दीर्घ कारावास के आधार पर जमानत संभव

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि किसी अपराधी ने लंबे समय तक कारावास झेला है और उसकी अपील की शीघ्र सुनवाई की संभावना नहीं है, तो NDPS अधिनियम की धारा 37 की कठोरता के बावजूद उसे जमानत दी जा सकती है। यह फैसला नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) बनाम लखविंदर सिंह मामले में सुनाया गया।

इस मामले में उच्च न्यायालय ने एक आरोपी की सजा को निलंबित करते हुए उसे जमानत दी थी। आरोपी को NDPS अधिनियम के तहत 10 वर्ष की कठोर सजा दी गई थी, लेकिन उसने पहले ही 4.5 वर्ष कारावास में बिता दिए थे।

NCB ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की, यह तर्क देते हुए कि NDPS अधिनियम की धारा 37 के तहत जमानत तभी दी जा सकती है जब आरोपी ने कम से कम आधी सजा पूरी कर ली हो।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा:

"यदि आरोपी ने अपनी सजा का महत्वपूर्ण हिस्सा काट लिया है और अपील की सुनवाई जल्द संभव नहीं है, तो न्यायालय सजा निलंबन और जमानत का अधिकार रखता है। इसे केवल धारा 37 के आधार पर अस्वीकार करना अनुचित होगा और यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी के अधिकारों का उल्लंघन होगा।"

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NDPS अधिनियम की धारा 37 जमानत देने में कड़ी शर्तें लगाती है, विशेष रूप से जब सजा 10 वर्ष या उससे अधिक की हो। इस धारा के अनुसार जमानत तभी संभव है यदि:

अभियोजन पक्ष को सुनने के बाद न्यायालय संतुष्ट हो कि आरोपी निर्दोष है।

यह साबित हो कि जमानत मिलने के बाद आरोपी पुनः अपराध नहीं करेगा।

    लेकिन, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि अपील की सुनवाई लंबित है और आरोपी पहले ही पर्याप्त कारावास भुगत चुका है, तो न्यायालय जमानत देने पर विचार कर सकता है।

    1. अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी के अधिकारों का संरक्षण : सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यदि अपील लंबी अवधि तक लंबित रहती है और आरोपी पूरी सजा भुगतने के कगार पर है, तो जमानत से इनकार करना अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन होगा।

    "यदि अदालतें जमानत देने के लिए अत्यधिक कठोर दृष्टिकोण अपनाती हैं, तो कई मामलों में आरोपी पूरी सजा भुगतने के बाद ही अपील पर सुनवाई करवा पाएंगे। यह उनके न्याय के अधिकार का हनन होगा।"

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    2. 'वन-टाइम डायरेक्शन' का महत्व : NCB ने सुप्रीम कोर्ट में "Supreme Court Legal Aid Committee vs. Union of India (1994)" का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि जमानत तब तक नहीं दी जानी चाहिए जब तक कि आरोपी ने आधी सजा पूरी न कर ली हो।

    लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा:

    "यह निर्णय केवल विशेष परिस्थितियों में दिया गया था और इसे एक सख्त नियम नहीं माना जा सकता।"

    3. अपील के लंबित रहने की समस्या : सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि अदालतें जमानत देने में सख्त नियम अपनाती हैं, तो कई मामलों में आरोपी की अपील की सुनवाई ही पूरी सजा भुगतने के बाद होगी, जिससे अपील का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

    "यह न्याय के उद्देश्य को विफल कर देगा और आरोपी को अपील के लाभ से वंचित कर देगा।"

    मामला: नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो बनाम लखविंदर सिंह

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