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ओडिशा हाईकोर्ट ने पत्नी और वयस्क अविवाहित बेटी के भरण-पोषण का आदेश बरकरार रखा, हिंदू कानून की जिम्मेदारी दोहराई

ओडिशा हाईकोर्ट ने पत्नी और वयस्क अविवाहित बेटी को 10,000 रुपये मासिक भरण-पोषण का आदेश बरकरार रखा, पिता की जिम्मेदारी दोहराई।

Vivek G.
ओडिशा हाईकोर्ट ने पत्नी और वयस्क अविवाहित बेटी के भरण-पोषण का आदेश बरकरार रखा, हिंदू कानून की जिम्मेदारी दोहराई

कटक, 16 सितम्बर: ओडिशा हाईकोर्ट ने एक पति की याचिका खारिज करते हुए कहा कि बेटी के 18 वर्ष पूरे होने पर पिता की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। जस्टिस जी. सतपथी ने सोमवार को फैसला सुनाते हुए परिवार न्यायालय के उस आदेश की पुष्टि की, जिसमें जी. देबेंद्र राव को अपनी पहली पत्नी जी. पुष्पा प्रभा राव और उनकी बेटी को प्रति माह 5,000–5,000 रुपये का भरण-पोषण जारी रखने का निर्देश दिया गया था।

पृष्ठभूमि

देबेंद्र और पुष्पा की शादी 2001 में हुई थी और उनकी एक बेटी है। दहेज से जुड़ी कहासुनी के बाद 2004 में दोनों अलग हो गए। बाद में देबेंद्र ने एकतरफा तलाक हासिल किया, जबकि पुष्पा ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की अर्जी दी। 2019 में बरगढ़ परिवार न्यायालय ने प्रति माह 10,000 रुपये का भरण-पोषण तय किया। अधिवक्ता देबेंद्र ने इसे चुनौती दी, यह कहते हुए कि उनकी पत्नी वकील होने के नाते पर्याप्त कमाती हैं और अब वयस्क हो चुकी बेटी को सहायता की आवश्यकता नहीं है।

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अदालत के अवलोकन

जस्टिस सतपथी ने आय के रिकॉर्ड, कानूनी मिसालों और परिस्थितियों की जांच के बाद इन दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा, “यदि अविवाहित बेटी स्वयं का पालन-पोषण करने में सक्षम नहीं है, तो पिता की जिम्मेदारी उसकी वयस्कता के बाद भी बनी रहती है,” और इसके लिए हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम (HAMA) की धारा 20(3) का हवाला दिया।

न्यायाधीश ने देबेंद्र की आय और संपत्ति, जिनमें जमीन और 6 लाख रुपये से अधिक वार्षिक कमाई दिखाने वाले आयकर रिकॉर्ड शामिल हैं, पर जोर दिया। इसके विपरीत, पुष्पा की वकालत से वास्तविक कमाई का कोई ठोस सबूत पेश नहीं हुआ।

अदालत ने टिप्पणी की, “हो सकता है कोई व्यक्ति अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत हो, लेकिन महीनों तक उसे काम न मिले,” और उनकी वित्तीय स्वतंत्रता के दावे को खारिज कर दिया।

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परित्याग के सवाल पर पीठ ने स्पष्ट किया कि देबेंद्र ने दूसरी शादी कर ली है, जिससे पुष्पा को अलग रहने का वैध कारण मिला। जस्टिस सतपथी ने कहा, “जब पति दूसरी शादी करता है, तो पत्नी का साथ न रहना उचित है।”

निर्णय

परिवार न्यायालय के आकलन को उचित ठहराते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि प्रति माह 5,000 रुपये प्रत्येक का भुगतान अत्यधिक नहीं है। न्यायाधीश ने आदेश दिया, “इस न्यायालय को हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं दिखता,” और बेटी की शादी तक भरण-पोषण जारी रखने का आदेश बरकरार रखा। पुनरीक्षण याचिका लागत के बिना खारिज कर दी गई।

मामला: जी. देबेंद्र राव बनाम जी. पुष्पा प्रभा राव एवं अन्य

मामला संख्या: आरपीएफएएम संख्या 18, 2021

निर्णय की तिथि: 16 सितंबर 2025

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