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2G लाइसेंस विवाद में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिस्टेमा को 2012 से रिजर्व प्राइस चुकाने का आदेश

भारत संघ बनाम सिस्टेमा श्याम टेलीसर्विसेज लिमिटेड, सुप्रीम कोर्ट ने 2G स्पेक्ट्रम मामले में सिस्टेमा श्याम को 2 फरवरी 2012 से रिजर्व प्राइस चुकाने का आदेश दिया, ब्याज 8 दिसंबर 2014 से देय।

Vivek G.
2G लाइसेंस विवाद में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिस्टेमा को 2012 से रिजर्व प्राइस चुकाने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार का दिन टेलीकॉम सेक्टर के लिए बेहद अहम रहा। अदालत ने साफ कर दिया कि 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस रद्द होने के बाद भी सेवाएं जारी रखने वाली कंपनियों को 2 फरवरी 2012 से ही सरकार द्वारा तय “रिजर्व प्राइस” (नीलामी की न्यूनतम कीमत) चुकानी होगी।

यह फैसला केंद्र सरकार की अपील पर आया, जिसमें टेलीकॉम विभाग (DoT) ने ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती दी थी।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 2012 के ऐतिहासिक 2जी स्पेक्ट्रम फैसले से जुड़ा है। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कई टेलीकॉम कंपनियों को दिए गए लाइसेंस रद्द कर दिए थे।

इस मामले में एक पक्ष था Union of India, जबकि दूसरी ओर थी Sistema Shyam Teleservices Limited।

2 फरवरी 2012 को कोर्ट ने लाइसेंस रद्द किए, लेकिन आम उपभोक्ताओं को अचानक सेवा बंद न हो, इसलिए कंपनियों को कुछ समय तक काम जारी रखने की अनुमति दी गई। बाद में नई नीलामी प्रक्रिया शुरू हुई।

15 फरवरी 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जो कंपनियां 2 फरवरी 2012 के बाद भी सेवाएं देती रहीं, उन्हें नवंबर 2012 की नीलामी के लिए तय रिजर्व प्राइस देना होगा।

इसी आदेश की व्याख्या को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

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सिस्टम श्याम ने जब DoT की मांग को चुनौती दी तो मामला टेलीकॉम विवाद निपटान एवं अपीलीय अधिकरण (TDSAT) पहुंचा।

TDSAT ने माना कि रिजर्व प्राइस की देनदारी 15 फरवरी 2013 से शुरू मानी जानी चाहिए, क्योंकि उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने भुगतान का स्पष्ट निर्देश दिया था।

साथ ही, ब्याज (इंटरेस्ट) की गणना भी TDSAT ने 8 दिसंबर 2014 से शुरू मानी - यानी शो-कॉज नोटिस की समयसीमा खत्म होने के बाद से।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में क्या हुआ

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पूरे घटनाक्रम को विस्तार से देखा। अदालत ने कहा कि 15 फरवरी 2013 के आदेश को गलत तरीके से पढ़ा गया है।

पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा,

“जब हमने अपने आदेश में ‘02.02.2012 के बाद’ संचालन जारी रखने वाले लाइसेंसधारकों का उल्लेख किया था, तो देनदारी उसी तारीख से शुरू मानी जाएगी।”

कोर्ट ने कहा कि अगर 15 फरवरी 2013 से देनदारी शुरू करनी होती, तो आदेश में वही तारीख लिखी जाती।

अदालत ने यह भी याद दिलाया कि कंपनियों को संचालन जारी रखने की अनुमति केवल जनता के हित में दी गई थी, न कि उनके लाभ के लिए।

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ब्याज पर अदालत की टिप्पणी

ब्याज के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने TDSAT के निर्णय को सही माना।

कोर्ट ने कहा कि DoT ने 2013 के आदेश के बावजूद 17 नवंबर 2014 तक कोई मांग नोटिस जारी नहीं किया।

पीठ ने टिप्पणी की,

“विभाग अपनी ही देरी का फायदा उठाकर पहले की अवधि का ब्याज नहीं मांग सकता।”

इसलिए ब्याज 8 दिसंबर 2014 से ही देय होगा - यानी शो-कॉज नोटिस की 21 दिन की अवधि खत्म होने के बाद से।

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अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने TDSAT के आदेश को आंशिक रूप से संशोधित किया।

अदालत ने आदेश दिया कि:

  • सिस्टेमा श्याम को नवंबर 2012 की नीलामी का रिजर्व प्राइस 2 फरवरी 2012 से चुकाना होगा।
  • जिन 8 सर्किलों में कंपनी मार्च 2013 की नीलामी में सफल रही, वहां देनदारी 30 अप्रैल 2013 तक होगी (Letter of Intent की तारीख तक)।
  • बाकी 13 सर्किलों में यह देनदारी 23 मार्च 2013 तक मानी जाएगी।
  • ब्याज SBI की प्राइम लेंडिंग रेट पर 8 दिसंबर 2014 से देय होगा।
  • पहले से चुकाई गई राशि को समायोजित किया जाएगा और शेष रकम 3 महीने के भीतर चुकानी होगी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि अपील स्वीकार की जाती है और पक्षकार अपने-अपने खर्च स्वयं वहन करेंगे।

Case Title: Union of India v. Sistema Shyam Teleservices Ltd.

Case No.: Civil Appeal No. 12219 of 2018

Decision Date: February 20, 2026

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