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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पारसनाथ डेवलपर्स को 8% ब्याज के साथ देना होगा कब्जा, NCDRC आदेश बरकरार

पार्श्वनाथ डेवलपर्स लिमिटेड बनाम मोहित खिरबत एवं अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने पारसनाथ डेवलपर्स को देरी से फ्लैट कब्जा देने पर 8% ब्याज सहित मुआवजा देने का आदेश बरकरार रखा।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पारसनाथ डेवलपर्स को 8% ब्याज के साथ देना होगा कब्जा, NCDRC आदेश बरकरार

दिल्ली के कोर्टरूम में सुनवाई के दौरान माहौल गंभीर था। घर का सपना लिए सालों से इंतज़ार कर रहे खरीदारों की कहानी और बिल्डर की दलीलों के बीच आज आखिरकार अंतिम शब्द सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने पारसनाथ ग्रुप की अपीलों को खारिज करते हुए साफ कर दिया कि घर खरीदारों के साथ अनुचित देरी को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने 8% सालाना ब्याज के साथ मुआवजा देने के आदेश को बरकरार रखा।

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मामले की पृष्ठभूमि

Parsvnath Developers Ltd. ने गुरुग्राम के सेक्टर-53 स्थित “पारसनाथ एक्सोटिका” प्रोजेक्ट में फ्लैट बेचे थे। खरीदारों ने लगभग पूरी कीमत अदा कर दी थी, लेकिन तय समय सीमा के भीतर न तो फ्लैट तैयार हुए और न ही कब्जा मिला।

तीनों मामलों में खरीदारों ने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का दरवाज़ा खटखटाया।

National Consumer Disputes Redressal Commission (NCDRC) ने बिल्डर को निर्माण पूरा कर ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (रहने की अनुमति प्रमाणपत्र) लेने और 8% ब्याज के साथ मुआवजा देने का आदेश दिया था।

बिल्डर ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

बिल्डर की दलील

सुनवाई के दौरान कंपनी की ओर से वरिष्ठ वकील ने कहा कि फ्लैट बायर एग्रीमेंट की शर्तों में देरी पर मुआवजा तय था - सिर्फ ₹10 प्रति वर्ग फुट प्रति माह।

उनका तर्क था कि NCDRC ने अनुबंध से आगे जाकर ब्याज दे दिया, जो गलत है।

उन्होंने यह भी कहा कि देरी सरकारी मंजूरी, मजदूरों की कमी और वित्तीय कठिनाइयों के कारण हुई।

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खरीदारों का पक्ष

खरीदारों की ओर से कहा गया कि उन्होंने 2013-14 तक लगभग पूरी रकम दे दी थी, लेकिन सालों तक कब्जा नहीं मिला।

एक खरीदार ने कोर्ट में कहा, “हमने अपना घर खरीदने के लिए जीवन की जमा पूंजी लगा दी, लेकिन हमें सिर्फ आश्वासन मिला।”

उनकी दलील साफ थी - बिना ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट के कब्जा देना कानूनन सही नहीं है।

अदालत की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उपभोक्ता आयोग की शक्तियां केवल अनुबंध तक सीमित नहीं हैं।

पीठ ने कहा, “मुआवजा देने की शक्ति कानून से आती है, न कि सिर्फ अनुबंध की शर्तों से।”

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कोर्ट ने माना कि बिल्डर द्वारा तय किया गया ₹10 प्रति वर्ग फुट का मुआवजा नाममात्र का था और खरीदारों की वास्तविक परेशानी को नहीं दर्शाता।

अदालत ने यह भी दोहराया कि बिना ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट के कब्जा देने की पेशकश वैध नहीं मानी जा सकती। यह ‘सेवा में कमी’ (deficiency in service) है।

8% ब्याज क्यों उचित?

कोर्ट ने कहा कि देरी लंबी थी, खरीदारों को आर्थिक और मानसिक परेशानी हुई। ऐसे में 8% सालाना ब्याज न तो अत्यधिक है और न ही अनुचित।

फैसले में कहा गया, “मुआवजा न्यायसंगत और परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए।”

साथ ही, कोर्ट ने यह भी देखा कि एक संबंधित मामले में 8% ब्याज पहले ही अंतिम रूप ले चुका है।

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अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने सभी अपीलें खारिज कर दीं।

  • बिल्डर को छह महीने के भीतर ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट प्राप्त कर कब्जा देना होगा।
  • जब तक कब्जा नहीं दिया जाता, 8% सालाना ब्याज का भुगतान जारी रहेगा।
  • तीसरे मामले में, जहां खरीदार ने 14 अगस्त 2022 को “जैसा है” आधार पर कब्जा लिया था, वहां सहमत तारीख से 14 अगस्त 2022 तक 8% ब्याज देय रहेगा।
  • अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी और मुकदमे का खर्च भी बिल्डर को वहन करना होगा।

कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि उपभोक्ताओं के अधिकारों को अनुबंध की एकतरफा शर्तों से कम नहीं किया जा सकता।

Case Title: Parsvnath Developers Ltd. v. Mohit Khirbat & Ors.

Case No.: Civil Appeal No. 5289 of 2022 (along with connected appeals)

Decision Date: February 20, 2026

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