नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की अदालत में सोमवार को एक ऐसा मामला सुना गया, जिसने कॉरपोरेट फाइनेंस और दिवाला कानून से जुड़े कई सवालों को साफ कर दिया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल किसी कंपनी द्वारा “फंड की व्यवस्था करने” का आश्वासन देना, उसे गारंटर नहीं बनाता। इसी आधार पर UV Asset Reconstruction Company Limited की अपील खारिज कर दी गई। यह फैसला 6 जनवरी 2026 को सुनाया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला वर्ष 2011 से जुड़ा है, जब Electrosteel Steels Limited ने SREI Infrastructure Finance Limited से 500 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था। इस कर्ज के लिए Electrosteel Castings Limited (ECL) ने एक Deed of Undertaking पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें यह कहा गया था कि जरूरत पड़ने पर वह ESL में फंड की व्यवस्था करेगी, ताकि वित्तीय शर्तों का पालन हो सके।
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बाद में SREI ने अपने अधिकार UV Asset Reconstruction Company Limited (UV ARC) को सौंप दिए। ESL के दिवाला समाधान (IBC) के तहत समाधान योजना लागू होने के बाद UV ARC ने यह दावा किया कि ECL वास्तव में गारंटर है और उस पर बकाया राशि की जिम्मेदारी बनती है।
UV ARC ने सबसे पहले NCLT में सेक्शन 7 के तहत याचिका दायर की, लेकिन ट्रिब्यूनल ने कहा कि ECL गारंटर नहीं है। इसके बाद मामला NCLAT पहुंचा, जहां भी यही निष्कर्ष निकला।
NCLAT ने साफ कहा कि Deed of Undertaking की शर्तें गारंटी की परिभाषा में नहीं आतीं। इसी आदेश को चुनौती देते हुए UV ARC सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
न्यायमूर्ति आलोक अराधे और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने मामले की गहराई से जांच की। अदालत ने कहा कि भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 126 के तहत गारंटी तभी मानी जाती है, जब कोई तीसरा व्यक्ति कर्जदार के डिफॉल्ट पर सीधे कर्ज चुकाने का वादा करे।
पीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की,
“केवल यह कहना कि जरूरत पड़ने पर फंड की व्यवस्था की जाएगी, इसे कर्ज चुकाने का वादा नहीं माना जा सकता।”
अदालत ने यह भी नोट किया कि न तो मूल लोन दस्तावेजों में और न ही सूचना ज्ञापन में ECL को गारंटर बताया गया था।
UV ARC की ओर से यह दलील भी दी गई कि ECL ने 38 करोड़ रुपये का भुगतान किया था, जो गारंटी होने का संकेत है। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि यह भुगतान प्रमोटर के रूप में स्वेच्छा से किया गया था, न कि किसी कानूनी गारंटी के तहत।
पीठ ने कहा कि एक बार की गई सहायता को गारंटी का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
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अदालत का अंतिम निर्णय
सभी दलीलों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT के फैसलों से सहमति जताई। अदालत ने साफ कहा कि Deed of Undertaking की क्लॉज 2.2 गारंटी नहीं बनाती और Electrosteel Castings Limited को गारंटर नहीं ठहराया जा सकता।
इसके साथ ही UV Asset Reconstruction Company Limited की अपील खारिज कर दी गई।
Case Title: UV Asset Reconstruction Company Ltd. vs Electrosteel Castings Ltd.
Case No.: Civil Appeal No. 9701 of 2024
Case Type: Insolvency & Bankruptcy Code – Section 7
Decision Date: 06 January 2026










