नई दिल्ली में हुई सुनवाई के दौरान Supreme Court of India ने औद्योगिक प्रोत्साहन नीति से जुड़े एक पुराने विवाद में अहम फैसला सुनाया। मामला IFGL Refractories Ltd. और Orissa State Financial Corporation सहित राज्य के अन्य औद्योगिक विभागों के बीच पूंजी निवेश सब्सिडी और डीजी सेट सब्सिडी के भुगतान से जुड़ा था।
करीब दो दशक पुराने इस विवाद में सवाल यह था कि क्या एक अलग मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को “नई औद्योगिक इकाई” माना जाएगा और क्या पहले स्वीकृत सब्सिडी को बाद में रोका जा सकता है।
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मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद IFGL Refractories की उस यूनिट से जुड़ा है, जिसे पहले Indo Flogates Limited ने स्थापित किया था। वर्ष 1989 की ओडिशा औद्योगिक नीति के तहत Indo Flogates ने MM Plant यूनिट को एक नई औद्योगिक इकाई के रूप में स्थापित किया और इसके लिए पूंजी निवेश सब्सिडी तथा डीजी सेट सब्सिडी के लिए आवेदन किया।
राज्य सरकार के संबंधित विभागों ने जांच के बाद इस यूनिट को नई औद्योगिक इकाई मानते हुए वर्ष 2003 में करीब ₹11.14 लाख की सब्सिडी स्वीकृत भी कर दी। बाद में Indo Flogates का IFGL Refractories में विलय हो गया और सभी अधिकार व दायित्व नई कंपनी को हस्तांतरित हो गए।
हालांकि, सब्सिडी स्वीकृत होने के बावजूद उसका भुगतान वर्षों तक नहीं हुआ। अंततः 2008 में राज्य स्तरीय समिति की उप-समिति ने यह कहते हुए भुगतान से इनकार कर दिया कि संबंधित कंपनियां पहले ही अधिकतम सब्सिडी सीमा का लाभ ले चुकी हैं।
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इस फैसले को चुनौती देते हुए IFGL Refractories ने ओडिशा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के निर्णय को सही मानते हुए कहा कि औद्योगिक नीति के तहत सब्सिडी का लाभ “केवल एक बार” ही दिया जा सकता है।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की पीठ ने औद्योगिक नीति, परिभाषाओं और सरकारी रिकॉर्ड का विस्तार से विश्लेषण किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1989 की औद्योगिक नीति में “नई औद्योगिक इकाई” की परिभाषा साफ तौर पर दी गई है।
पीठ ने कहा,
“यदि किसी औद्योगिक इकाई में नीति की प्रभावी तिथि के बाद नया पूंजी निवेश किया गया है, तो वह इकाई ‘नई औद्योगिक इकाई’ मानी जाएगी, भले ही कंपनी पहले से अस्तित्व में क्यों न हो।”
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कोर्ट ने यह भी नोट किया कि संबंधित सरकारी विभागों ने खुद MM Plant यूनिट को नई औद्योगिक इकाई मानते हुए सब्सिडी स्वीकृत की थी। ऐसे में वर्षों बाद उसी निर्णय से पलटना प्रशासनिक असंगति को दर्शाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि पहले की नीतियों के तहत अधिकतम सीमा पूरी हो चुकी थी। पीठ ने कहा कि जिस समय सब्सिडी स्वीकृत की गई, उस समय नीति में ऐसा कोई स्पष्ट प्रतिबंध लागू नहीं था।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“जब एक बार पात्रता तय कर सब्सिडी स्वीकृत कर दी गई हो, तो केवल बाद की व्याख्या या प्रशासनिक निर्देश के आधार पर उसका भुगतान रोका नहीं जा सकता।”
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अदालत का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि MM Plant यूनिट को नई औद्योगिक इकाई माना जाना सही था और उसे 1989 की औद्योगिक नीति के तहत पूंजी निवेश सब्सिडी और डीजी सेट सब्सिडी का लाभ मिलना चाहिए।
इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए कि IFGL Refractories को पहले से स्वीकृत ₹11.14 लाख की सब्सिडी का भुगतान किया जाए।
Case Title: IFGL Refractories Ltd. vs Orissa State Financial Corporation & Ors.
Case No.: Civil Appeal No. 66 of 2026
Case Type: Civil Appeal (Industrial Subsidy Dispute)
Decision Date: 6 January 2026










