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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ ज़मानत आदेशों के आधार पर जज को हटाना गलत, सेवा बहाली के निर्देश

निर्भय सिंह सुलिया बनाम मध्य प्रदेश राज्य, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल ज़मानत आदेशों के आधार पर न्यायिक अधिकारी को हटाना गलत है। सेवा बहाली और पूरा बकाया वेतन देने का आदेश।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ ज़मानत आदेशों के आधार पर जज को हटाना गलत, सेवा बहाली के निर्देश

नई दिल्ली में हुई सुनवाई के दौरान Supreme Court of India ने न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर एक अहम संदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल ज़मानत आदेशों में कथित कानूनी त्रुटियों के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी को सेवा से हटाना उचित नहीं है। इस फैसले के साथ अदालत ने मध्यप्रदेश के एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी को बड़ी राहत दी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला निरभय सिंह सुलिया से जुड़ा है, जो मध्यप्रदेश न्यायिक सेवा में लगभग 27 वर्षों तक बेदाग सेवा दे चुके थे। उन्हें कुछ मामलों में आबकारी अधिनियम के तहत ज़मानत देने के आदेशों को लेकर विभागीय कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

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आरोप यह था कि कुछ ज़मानत आदेशों में धारा 59-A का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया, जबकि अन्य मामलों में उसी धारा का हवाला दिया गया था। इसी आधार पर “दोहरा मापदंड” अपनाने और “दुराशय” का आरोप लगाते हुए उन्हें सेवा से हटा दिया गया।

विभागीय जांच में एक आरोप सिद्ध माना गया, जबकि दूसरा आरोप असिद्ध रहा। इसके बावजूद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट की सिफारिश पर 2014 में अधिकारी को सेवा से हटा दिया।
इसके खिलाफ दायर रिट याचिका को भी 2024 में हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था।

अपील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पूरे रिकॉर्ड, जांच रिपोर्ट और गवाहों के बयानों का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने यह भी नोट किया कि:

  • मूल शिकायतकर्ता को जांच में गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया
  • अभियोजन पक्ष के गवाहों ने आरोपों का समर्थन नहीं किया
  • जिन ज़मानत आदेशों पर सवाल उठे, उनमें कारण दर्ज थे, भले ही कानून की धारा का स्पष्ट उल्लेख न हो

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अदालत की अहम टिप्पणियां

पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा:

“केवल इस आधार पर कि किसी आदेश में किसी विशेष कानूनी प्रावधान का उल्लेख नहीं है, यह मान लेना कि वह आदेश बेईमानी से पारित किया गया, एक खतरनाक सिद्धांत होगा।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि हर गलत या अलग दृष्टिकोण वाला न्यायिक आदेश अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार नहीं बन सकता।

न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई तभी हो सकती है जब भ्रष्टाचार, बाहरी दबाव या दुर्भावना के ठोस सबूत हों।

अदालत ने चेताया कि अगर हर ज़मानत आदेश पर अनुशासनात्मक तलवार लटकती रहेगी, तो निचली अदालतों के जज स्वतंत्र और निडर होकर निर्णय नहीं ले पाएंगे।

एक अन्य टिप्पणी में कहा गया:

“न्यायाधीश का काम फैसला देना है। केवल यह देखना कि फैसला सही था या गलत, अनुशासनात्मक कार्रवाई का मापदंड नहीं हो सकता।”

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अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने:

  • सेवा से हटाने का आदेश रद्द किया
  • अपीलीय आदेश और हाईकोर्ट के फैसले को भी निरस्त किया
  • अधिकारी को सेवानिवृत्ति की आयु तक सेवा में माना
  • पूरे बकाया वेतन और सभी लाभ 6% ब्याज के साथ देने का निर्देश दिया

अदालत ने यह भी कहा कि यह फैसला सभी हाईकोर्टों तक भेजा जाए, ताकि न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई में सावधानी बरती जाए।

Case Title: Nirbhay Singh Suliya vs State of Madhya Pradesh

Case No.: Civil Appeal No. 40 of 2026

Case Type: Service / Disciplinary Matter

Decision Date: 5 January 2026

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