मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि केवल इसलिए किसी तलाकशुदा बेटी को फैमिली पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि पेंशन नियमों में उसका नाम स्पष्ट रूप से शामिल नहीं है। अदालत ने माना कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
न्यायमूर्ति विशाल धगत ने यह आदेश ज्योति श्रीवास्तव द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। याचिकाकर्ता ने अपने दिवंगत पिता की फैमिली पेंशन पाने के लिए आवेदन किया था, जिसे विभाग ने अस्वीकार कर दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ज्योति श्रीवास्तव, स्वर्गीय शंकर लाल श्रीवास्तव की बेटी हैं, जो होम गार्ड विभाग में जिला कमांडेंट के पद से 30 अप्रैल 2001 को सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी पत्नी का निधन 8 जून 2017 को हो गया था। इसके बाद उन्होंने अपनी तलाकशुदा बेटी को फैमिली पेंशन के लिए नामित करने का आवेदन दिया था।
हालांकि, 16 दिसंबर 2021 को डायरेक्टर जनरल, होम गार्ड्स एंड सिविल डिफेंस ने आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मध्य प्रदेश सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 में तलाकशुदा बेटी को “परिवार” की परिभाषा में शामिल नहीं किया गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि केंद्र सरकार ने 11 सितंबर 2013 को जारी कार्यालय ज्ञापन में स्पष्ट किया था कि आश्रित तलाकशुदा बेटियां भी कुछ शर्तों के अधीन फैमिली पेंशन पाने की हकदार हैं। इस संबंध में खजनी देवी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया सहित अन्य फैसलों का भी हवाला दिया गया।
हाई कोर्ट ने नियमों का अध्ययन करते हुए कहा कि भले ही “तलाकशुदा बेटी” शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन विवाहित बेटियों को परिवार की परिभाषा में शामिल किया गया है।
अदालत ने कहा कि अविवाहित, विधवा और विवाहित बेटियों को शामिल करना लेकिन तलाकशुदा बेटी को बाहर रखना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।
अदालत ने टिप्पणी की,
“यदि विवाहित बेटी को परिवार का सदस्य माना गया है, तो तलाकशुदा बेटी को बाहर रखने का कोई उचित कारण नहीं है।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फैमिली पेंशन पाने के लिए आश्रित होना जरूरी शर्त है। यानी संबंधित व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि वह मृत सरकारी कर्मचारी पर निर्भर थी और उसकी अपनी स्वतंत्र आय नहीं थी।
हाई कोर्ट ने 16 दिसंबर 2021 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके जरिए याचिकाकर्ता का दावा खारिज किया गया था।
कोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता के मामले पर दोबारा विचार करें। यदि यह पाया जाता है कि वह अपने दिवंगत पिता पर आश्रित थीं और उनकी कोई स्वतंत्र आय नहीं है, तो उन्हें फैमिली पेंशन का लाभ दिया जाए।
अदालत ने सक्षम प्राधिकारी को 90 दिनों के भीतर नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया।
Case Details:
Case Title: Smt. Jyoti Shrivastava v. State of Madhya Pradesh and Others
Case Number: Writ Petition No. 1666 of 2022
Judge: Justice Vishal Dhagat
Decision Date: May 12, 2026











