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सुप्रीम कोर्ट ने 1998 गैंगरेप मामले में दो आरोपियों को बरी किया, कहा- अभियोजन आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका

राजेंद्र एवं अन्य बनाम उत्तराखंड राज्य, सुप्रीम कोर्ट ने 1998 गैंगरेप मामले में दो आरोपियों को बरी किया, कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने 1998 गैंगरेप मामले में दो आरोपियों को बरी किया, कहा- अभियोजन आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका

सुप्रीम कोर्ट ने 1998 के एक कथित गैंगरेप मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए दो आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि मामले में पेश किए गए सबूत और गवाही ऐसे नहीं हैं जिनसे आरोप “संदेह से परे” साबित हो सकें। अदालत ने यह भी पाया कि पीड़िता के बयान में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं और अभियोजन पक्ष आरोपों को भरोसेमंद ढंग से सिद्ध नहीं कर सका।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला देहरादून के डालनवाला थाना क्षेत्र से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार, 7 अप्रैल 1998 की शाम लगभग 7:30 बजे पीड़िता बाजार से घर लौट रही थी, तभी चार लोगों-राजेंद्र, पप्पू उर्फ हनुमान, सुशील कुमार और किशन-ने कथित तौर पर उसे पकड़ लिया।

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शिकायत में कहा गया कि आरोपियों ने उसका मुंह दबाया, आंखों पर कपड़ा बांधा और पास के एक प्लॉट में ले जाकर उसके साथ बारी-बारी से बलात्कार किया। बाद में आरोपियों ने उसे धमकी दी कि अगर उसने घटना के बारे में किसी को बताया तो उसे मार दिया जाएगा।

घटना के लगभग तीन महीने बाद, 31 जुलाई 1998 को पीड़िता ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, देहरादून को लिखित शिकायत दी, जिसके आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 427 और 506 के तहत एफआईआर दर्ज की गई।

जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने चारों आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। सत्र न्यायालय, देहरादून ने 2000 में चारों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए धारा 376(2)(g) आईपीसी के तहत 10 साल के कठोर कारावास और धारा 506 के तहत अतिरिक्त सजा सुनाई।

इसके बाद आरोपियों ने उत्तराखंड हाई कोर्ट में अपील दायर की, लेकिन हाई कोर्ट ने 2012 में सत्र न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कहा था कि ऐसे मामलों में अक्सर पीड़िता ही मुख्य गवाह होती है और उसके बयान पर भरोसा किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हुए आरोपियों के वकील ने कहा कि मामले में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं।

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उन्होंने दलील दी कि:

  • घटना के लगभग तीन महीने बाद एफआईआर दर्ज की गई और इस देरी का संतोषजनक कारण नहीं बताया गया।
  • पीड़िता के बयान और एफआईआर में घटना की जगह और परिस्थितियों को लेकर अलग-अलग बातें कही गईं।
  • पीड़िता और आरोपियों के बीच पहले से पानी के विवाद को लेकर दुश्मनी थी, जिसके कारण झूठा मामला दर्ज कराया गया हो सकता है।

न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

पीठ ने कहा, “मामला पूरी तरह पीड़िता की गवाही पर आधारित है, लेकिन उसका बयान अदालत का विश्वास पैदा करने में असफल रहता है।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि घटना के बाद पीड़िता ने लंबे समय तक किसी परिजन को इसकी जानकारी नहीं दी, जो कि सामान्य परिस्थितियों में अपेक्षित व्यवहार नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जिन लोगों को घटना के बारे में बताया गया था, उन्हें अदालत में गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया। इसके अलावा, पीड़िता के बयान में कई महत्वपूर्ण असंगतियां भी सामने आईं, जिससे अभियोजन की कहानी कमजोर हो गई।

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सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से आरोपियों की संलिप्तता स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं होती।

पीठ ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है, इसलिए दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता।

अदालत ने हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए आरोपियों की दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया। साथ ही आदेश दिया कि यदि वे किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।

Case Title: Rajendra & Ors v. State of Uttarakhand

Case No.: Criminal Appeal No. 264 of 2015

Decision Date: 13 March 2026

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