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जम्मू-कश्मीर HC ने आतंकी संबंधों के चलते UAPA मामले में जहूर अहमद मीर की जमानत खारिज कर दी

J&K हाईकोर्ट ने ज़ाहूर अहमद मीर की यूएपीए मामले में ज़मानत याचिका खारिज की, कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा और मज़बूत प्रथम दृष्टया साक्ष्यों का हवाला दिया।

Vivek G.
जम्मू-कश्मीर HC ने आतंकी संबंधों के चलते UAPA मामले में जहूर अहमद मीर की जमानत खारिज कर दी

जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख हाईकोर्ट, श्रीनगर ने 31 जुलाई 2025 को ज़ाहूर अहमद मीर द्वारा दायर की गई ज़मानत याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता पर

“मामले की गंभीरता और ट्रायल की स्थिति को देखते हुए आरोपी को ज़मानत देने का कोई आधार नहीं बनता।” — माननीय न्यायमूर्ति संजय परिहार

मामला

अनंतनाग निवासी 37 वर्षीय ज़ाहूर अहमद मीर को पुलिस स्टेशन पहलगाम में 6 मई 2022 को दर्ज एफआईआर संख्या 30/2022 में गिरफ्तार किया गया था। उस पर UAPA की धारा 18, 19, और 39 के तहत आतंकियों की मदद और पनाह देने का आरोप है।

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प्रॉसिक्यूशन के अनुसार, उसे एक तलाशी अभियान के दौरान संदेहास्पद गतिविधियों में पकड़ा गया और पूछताछ में उसने कथित रूप से आतंकियों को लॉजिस्टिक सपोर्ट देने और उन्हें छिपने की जगह मुहैया कराने की बात कबूली।

  • ज़ाहूर के आतंकियों आदिल गुलज़ार, रोशन ज़मीर और अशरफ़ मोलवी से संबंध थे।
  • उसने मोहम्मद इकबाल खान के साथ मिलकर श्रीचेन के जंगलों में आतंकियों को खाना और शरण दी।
  • उसकी सूचना पर हुई तलाशी में होकार्ड फॉरेस्ट में तीन आतंकवादी मारे गए।
  • उसके रिश्तेदार नाज़िर अहमद मीर (मारे गए) और मुदस्सिर मीर (यूएपीए आरोपी) का भी आतंकी कनेक्शन है।

ज़मानत याचिका में कहा गया कि:

  • उसे 6 मई से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था और झूठा फंसाया गया है।
  • उसे और इकबाल खान को मानव ढाल (Human Shield) के रूप में इस्तेमाल किया गया।
  • गवाहों में से किसी ने भी उसके खिलाफ ठोस बयान नहीं दिया।

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हालांकि, कोर्ट ने पाया कि इन दावों के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया।

न्यायमूर्ति संजय परिहार और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की बेंच ने यूएपीए की धारा 43-D का हवाला देते हुए ज़मानत के लिए सख्त मापदंडों की बात की।

“यूएपीए में ज़मानत अपवाद है और जेल ही सामान्य नियम है।” — कोर्ट, 'ज़ाहूर वाटाली' (2019) और 'गुरविंदर सिंह' (2024) केसों का हवाला

कोर्ट ने यह भी कहा कि ज़ाहूर की सूचना पर आतंकियों की मुठभेड़ में मौतें हुईं, जो प्रथम दृष्टया गंभीर साक्ष्य हैं। चूंकि ट्रायल अभी चल रहा है और अधिकतर गवाहों की जिरह बाकी है, इसलिए ज़मानत उचित नहीं है।

  • ट्रायल कोर्ट द्वारा ज़मानत खारिज करने का आदेश उचित था।
  • यूएपीए की गंभीर धाराओं में प्रथम दृष्टया पुख्ता केस है।
  • यदि आगे चलकर परिस्थिति में कोई बदलाव होता है तो ज़ाहूर ट्रायल कोर्ट में दोबारा ज़मानत याचिका दे सकता है।

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“हम याचिका को खारिज करते हैं, परंतु याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट में फिर से याचिका दायर करने की स्वतंत्रता है।”

मामला: ज़हूर अहमद मीर बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश
प्राथमिकी संख्या: 30/2022 (पी/एस पहलगाम)
मामला संख्या: CrlA(D) संख्या 82/2024
निर्णय तिथि: 31 जुलाई 2025

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