मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक अहम आदेश में कहा कि अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ लिखित आरोप लगाए गए हों और वे सार्वजनिक रूप से प्रकाशित भी हुए हों, तो मानहानि (defamation) के मामले में यह जांच ट्रायल के दौरान ही होगी कि आरोप सच थे या सार्वजनिक हित में लगाए गए थे। अदालत ने इस आधार पर दायर याचिका खारिज कर दी और निचली अदालतों के आदेश को बरकरार रखा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला अधिवक्ता दिनेश दीक्षित बनाम राकेश सिंह बघेल एवं अन्य से जुड़ा है। याचिकाकर्ता दिनेश दीक्षित, जो उस समय जिला बार एसोसिएशन शाहडोल के अध्यक्ष भी रह चुके थे, ने पुलिस अधीक्षक को एक लिखित शिकायत दी थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया था कि प्रतिवादी राकेश सिंह बघेल और एक अन्य व्यक्ति ने कथित तौर पर दस्तावेजों में हेरफेर कर नगरपालिका चुनाव में “साइकिल” चुनाव चिह्न हासिल किया।
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बाद में इस शिकायत की खबर एक स्थानीय अखबार में भी प्रकाशित हुई। हालांकि, याचिकाकर्ता ने बाद में अपनी निजी शिकायत अदालत से वापस ले ली। इसके बाद प्रतिवादियों ने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाकर उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया गया, और इसी आधार पर मानहानि सहित अन्य धाराओं में शिकायत दायर की गई।
मामले की सुनवाई के दौरान मजिस्ट्रेट अदालत ने शिकायत और गवाहों के बयान देखने के बाद भारतीय दंड संहिता की धारा 500 (मानहानि की सजा) के तहत संज्ञान लिया।
इसके खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका को भी सत्र न्यायालय ने खारिज कर दिया और कहा कि प्रथम दृष्टया मानहानि का मामला बनता है।
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याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने जो आरोप लगाए थे, वे राज्य निर्वाचन आयोग की सामग्री और कानून के प्रावधानों के आधार पर लगाए गए थे।
उनका कहना था कि यह आरोप “सार्वजनिक हित” में और “सच्चाई” के आधार पर लगाए गए थे, इसलिए यह भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के पहले और तीसरे अपवाद के अंतर्गत सुरक्षित हैं।
वहीं प्रतिवादियों के वकील ने कहा कि चुनाव हारने के बाद याचिकाकर्ता ने झूठे आरोप लगाए और उन्हें अखबार में प्रकाशित कराकर उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया।
न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकल पीठ ने कहा कि मानहानि के अपराध के लिए कुछ बुनियादी तत्व जरूरी होते हैं किसी व्यक्ति के बारे में आरोप लगाना, उसे शब्दों या लिखित रूप में व्यक्त करना, और उससे उस व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने की संभावना होना।
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अदालत ने कहा,
“यह तय करना कि आरोप सही थे, सार्वजनिक हित में थे या सद्भावना में लगाए गए थे-ये सभी तथ्य और कानून से जुड़े मिश्रित प्रश्न हैं, जिनका फैसला साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि संज्ञान लेने के चरण में अदालत को केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया अपराध के तत्व मौजूद हैं या नहीं, न कि बचाव पक्ष के सबूतों का विस्तृत परीक्षण करना।
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अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया यह दिखता है कि प्रतिवादियों के खिलाफ जालसाजी और साजिश के आरोप लगाए गए थे और वे तीसरे पक्ष तक पहुंचे, जिनमें अखबार में प्रकाशन भी शामिल है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों के आदेश में कोई स्पष्ट त्रुटि या अवैधता नहीं है।
अंततः अदालत ने धारा 482 सीआरपीसी के तहत दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि आरोपी यदि चाहें तो अपने बचाव में धारा 499 के अपवादों का लाभ ट्रायल के दौरान साक्ष्य पेश कर साबित कर सकते हैं।
Case Title: Dinesh Dixit v. Rakesh Singh Baghel & Others
Case Number: Misc. Criminal Case No. 7000 of 2019
Date of Decision: 25 February 2026
Judge: Hon’ble Justice Himanshu Joshi










