इंदौर खंडपीठ में सोमवार को एक अहम सुनवाई हुई। बांग्लादेश की नागरिक लीमा उर्फ रिया शेख ने अपनी निरंतर हिरासत को चुनौती देते हुए रिहाई की मांग की थी। लेकिन अदालत ने साफ किया कि फिलहाल उन्हें रिहा नहीं किया जा सकता। साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि छह महीने के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी की जाए।
पीठ में न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी शामिल थे।
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मामले की पृष्ठभूमि
याचिका संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर की गई थी। यह हैबियस कॉर्पस याचिका थी, जिसमें दावा किया गया कि याचिकाकर्ता को अवैध और असंवैधानिक तरीके से हिरासत में रखा गया है।
राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता वर्ष 2020 के एक आपराधिक मामले में आरोपी हैं। उन पर भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं - जैसे अपहरण, अवैध बंधन और आपराधिक धमकी - के अलावा विदेशियों से जुड़े कानूनों के तहत भी आरोप लगे हैं।
हालांकि, अदालत ने पहले उन्हें जमानत दे दी थी। लेकिन मुकदमे की सुनवाई पूरी न होने के कारण उन्हें इंदौर जिला जेल स्थित निरोध केंद्र (डिटेंशन सेंटर) में रखा गया है। जिला दंडाधिकारी, इंदौर ने इस संबंध में आदेश भी पारित किया है।
याचिकाकर्ता की मांग
याचिका में कहा गया था कि:
- उन्हें तुरंत रिहा किया जाए और किसी मान्यता प्राप्त संस्था की निगरानी में रखा जाए।
- छह साल से अधिक समय तक हिरासत में रहने को न्यायिक हिरासत माना जाए।
- मुकदमे को छह महीने में पूरा करने का आदेश दिया जाए।
- संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो।
- मुआवजा दिया जाए।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जमानत मिलने के बावजूद उन्हें निरंतर निरोध में रखना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
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अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ किया कि याचिकाकर्ता जेल में नहीं बल्कि डिटेंशन सेंटर में रखी गई हैं। इसलिए तत्काल रिहाई का आदेश देना उचित नहीं होगा।
पीठ ने कहा, “यह विवादित नहीं है कि मुकदमा अभी लंबित है और किसी भी समय अभियुक्त की उपस्थिति आवश्यक हो सकती है।”
अदालत ने आगे यह भी जोड़ा, “वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए उनकी सुरक्षा के लिए उन्हें डिटेंशन सेंटर में रखना उचित है।”
हालांकि, अदालत ने इस बात को गंभीरता से लिया कि मुकदमा छह वर्षों से लंबित है।
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अदालत का निर्णय
अदालत ने राज्य के वकील को निर्देश दिया कि अभियोजन एजेंसी को आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से छह महीने के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी करने के लिए कहा जाए। इसमें गवाहों की पेशी और अन्य जरूरी प्रक्रिया में तेजी लाई जाए।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि छह महीने के भीतर मुकदमे में कोई प्रगति नहीं होती है, तो याचिकाकर्ता को दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता होगी।
तत्काल रिहाई, मुआवजा या अधिकारियों के खिलाफ जांच संबंधी मांगों पर अदालत ने कोई राहत नहीं दी।
इसी के साथ याचिका का निपटारा कर दिया गया।
Case Title: Lima @ Riya Sheikh vs State of Madhya Pradesh & Others
Case No.: Writ Petition No. 5831 of 2026
Decision Date: 23 February 2026










