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तिरंगा उल्टा फहराने के आरोप में 89 वर्षीय व्यक्ति को बड़ी राहत, बॉम्बे हाईकोर्ट ने FIR रद्द की

वी. के. नारायणन बनाम महाराष्ट्र राज्य, बॉम्बे हाईकोर्ट ने तिरंगा उल्टा फहराने के आरोप में दर्ज 2017 की FIR रद्द की। कोर्ट ने कहा, जानबूझकर अपमान साबित नहीं हुआ।

Vivek G.
तिरंगा उल्टा फहराने के आरोप में 89 वर्षीय व्यक्ति को बड़ी राहत, बॉम्बे हाईकोर्ट ने FIR रद्द की

गणतंत्र दिवस पर तिरंगा उल्टा फहराने के आरोप में दर्ज आपराधिक मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने 89 वर्षीय वी.के. नारायणन को बड़ी राहत दी है। अदालत ने पाया कि उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर और आरोप पत्र में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उन्होंने जानबूझकर राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया।

न्यायमूर्ति आश्विन डी. भोबे की एकल पीठ ने 23 फरवरी 2026 को यह फैसला सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 26 जनवरी 2017 का है। मुंबई के चेंबूर स्थित ‘श्री रजनी सोसायटी’ में सुबह करीब 9:15 बजे ध्वजारोहण कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम के बाद सदस्य अपने-अपने काम पर चले गए।

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शाम करीब 4 बजे पुलिस को सूचना मिली कि सोसायटी की छत पर फहराया गया तिरंगा उल्टा है। इसके बाद तिलक नगर पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई।

वी.के. नारायणन सहित छह लोगों के खिलाफ राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 2(4)(l) के तहत मामला दर्ज किया गया।

धारा 2(4)(l) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर तिरंगे को “केसरिया नीचे” की स्थिति में प्रदर्शित करता है, तो यह अपराध माना जाता है।

आवेदक की दलील

आवेदक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि नारायणन अब 89 वर्ष के हैं, अस्वस्थ हैं और चलने-फिरने में असमर्थ हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि एफआईआर में केवल उनकी उपस्थिति का उल्लेख है, यह कहीं नहीं बताया गया कि ध्वज उन्होंने फहराया या उल्टा लगाया।

वकील ने तर्क दिया, “सिर्फ मौके पर मौजूद होना अपराध नहीं बनता, जब तक कि जानबूझकर अपमान का इरादा साबित न हो।”

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उन्होंने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष कोई स्वतंत्र गवाह या साक्ष्य पेश नहीं कर पाया, जिससे यह सिद्ध हो कि ध्वज को जानबूझकर उल्टा फहराया गया।

अदालत की टिप्पणी

अदालत ने रिकॉर्ड का अध्ययन करते हुए कहा कि धारा 2(4)(l) के तहत अपराध साबित करने के लिए “इरादा” यानी mens rea जरूरी है।

पीठ ने स्पष्ट कहा, “केवल यह आरोप कि आवेदक ध्वजारोहण के समय मौजूद थे, पर्याप्त नहीं है। यह दिखाना आवश्यक है कि उन्होंने जानबूझकर तिरंगे का अपमान किया।”

अदालत ने पाया कि चौकीदार के बयान में भी कहीं यह उल्लेख नहीं है कि नारायणन ने स्वयं ध्वज फहराया या उसे उल्टा लगाया।

साथ ही, मजिस्ट्रेट द्वारा 3 जुलाई 2017 को लिया गया संज्ञान आदेश भी बिना कारण दर्ज किया गया था। हाईकोर्ट ने इसे “रबर-स्टैम्प संज्ञान” करार दिया।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संज्ञान लेना एक न्यायिक प्रक्रिया है और उसमें दिमाग का इस्तेमाल दिखना चाहिए। केवल औपचारिक आदेश पर्याप्त नहीं है।

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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है, लेकिन कानून के तहत अपराध तभी बनता है जब जानबूझकर अपमान किया गया हो।

यहां अभियोजन पक्ष ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने तिरंगे को जानबूझकर उल्टा लगाया।

अंतिम फैसला

सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने एफआईआर नंबर 13/2017, आरोप पत्र (460/PS/2017) और मजिस्ट्रेट का संज्ञान आदेश रद्द कर दिया।

क्रिमिनल एप्लीकेशन नंबर 7 ऑफ 2026 को स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा कि आगे की कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले में कोई लागत (cost) नहीं लगाई जाएगी।

Case Title: V. K. Narayanan vs State of Maharashtra

Case No.: Criminal Application No. 7 of 2026

Decision Date: 23 February 2026

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