मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

3 दिन की 'गैरकानूनी हिरासत' का दावा खारिज: पटना हाईकोर्ट ने कहा- समय पर चुनौती नहीं दी

लल्लन कुमार यादव बनाम बिहार राज्य एवं अन्य। पटना हाईकोर्ट ने 3 दिन की कथित गैरकानूनी हिरासत पर याचिका खारिज की, कहा– समय पर चुनौती नहीं दी गई।

Vivek G.
3 दिन की 'गैरकानूनी हिरासत' का दावा खारिज: पटना हाईकोर्ट ने कहा- समय पर चुनौती नहीं दी

पटना हाईकोर्ट में शुक्रवार को एक ऐसे मामले की सुनवाई हुई, जिसमें याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसे पुलिस ने तीन दिन तक गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखा। अदालत कक्ष में बहस के दौरान पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारी की प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों पर लंबी चर्चा हुई।

न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार की एकल पीठ ने अंततः याचिका खारिज कर दी, लेकिन पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को कड़ी सीख भी दी।

Read also:- पुराने आपराधिक मामले के बावजूद नौकरी का हक: गुजरात HC ने भर्ती रोके जाने का आदेश किया रद्द

मामला क्या था

यह याचिका Patna High Court में दायर की गई थी, जिसमें लल्लन कुमार यादव ने कहा कि उन्हें 30 जुलाई 2020 से 1 अगस्त 2020 तक बिना किसी एफआईआर के सिवान जिले के सोनपुर थाना पुलिस ने हिरासत में रखा।

उनका कहना था कि एफआईआर 1 अगस्त 2020 को दर्ज हुई, जबकि उन्हें दो दिन पहले ही पकड़ लिया गया था। बाद में 2 अगस्त को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जिन धाराओं में केस दर्ज हुआ था, उनमें अधिकतम सजा सात साल से कम है। ऐसे मामलों में गिरफ्तारी से पहले नोटिस देना और कारण दर्ज करना जरूरी होता है। इसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य का हवाला दिया।

याचिकाकर्ता की दलील

अदालत में याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, “बिना एफआईआर के हिरासत में रखना कानून के खिलाफ है। न तो गिरफ्तारी का कारण दर्ज किया गया और न ही धारा 41ए के तहत नोटिस दिया गया।”

Read also:- मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटी को ज़हर देने का मामला: मद्रास हाईकोर्ट ने माता-पिता की उम्रकैद बरकरार रखी

उन्होंने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट को यह देखना चाहिए था कि पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया या नहीं।

याचिकाकर्ता ने इस आधार पर मुआवजे की मांग की।

राज्य का पक्ष

राज्य की ओर से पेश वकील ने इन आरोपों से इनकार किया। उनका कहना था कि 30 जुलाई को याचिकाकर्ता को सिर्फ पूछताछ के लिए बुलाया गया था, गिरफ्तार नहीं किया गया।

उन्होंने अदालत से कहा, “गिरफ्तारी 1 अगस्त को एफआईआर दर्ज होने के बाद हुई और अगले ही दिन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।”

राज्य ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने कभी रिमांड आदेश को चुनौती नहीं दी। उन्होंने नियमित जमानत मांगी और जमानत मिलने के बाद रिहा हो गए। ऐसे में बाद में गिरफ्तारी को गैरकानूनी बताना सही नहीं है।

कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार ने केस डायरी देखी। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे साबित हो कि 30 जुलाई को गिरफ्तारी हुई थी।

पीठ ने कहा, “रिमांड आदेश को कभी चुनौती नहीं दी गई। ऐसे में गिरफ्तारी की वैधता अब सवाल के घेरे में नहीं लाई जा सकती।”

हालांकि अदालत ने यह भी माना कि केस डायरी में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के पालन का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Arnesh Kumar और बाद के निर्णय Mohd. Asfak Alam का जिक्र करते हुए कहा कि पुलिस और मजिस्ट्रेट दोनों की जिम्मेदारी है कि सात साल तक की सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी से पहले नियमों का सख्ती से पालन हो।

पीठ ने टिप्पणी की, “मजिस्ट्रेट को भी यह देखना चाहिए था कि गिरफ्तारी के समय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन हुआ या नहीं। यह कर्तव्य निभाया नहीं गया।”

Read also:- चाइनीज मांझा पर सख्त हुई इलाहाबाद हाईकोर्ट, राज्य से पूछा- आदेश क्यों नहीं हो रहे लागू?

अदालत का फैसला

इन टिप्पणियों के बावजूद अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने समय रहते गिरफ्तारी और रिमांड को चुनौती नहीं दी। उन्होंने पहले जमानत ली और रिहा हो गए।

अदालत ने स्पष्ट कहा, “अब इस चरण पर गिरफ्तारी की वैधता पर सवाल उठाना बहुत देर हो चुकी है।”

इसी आधार पर कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और मुआवजे की मांग अस्वीकार कर दी ।

प्रशासन को निर्देश

हालांकि याचिका खारिज कर दी गई, लेकिन अदालत ने आदेश दिया कि इस फैसले की प्रति सभी न्यायिक अधिकारियों और बिहार के पुलिस महानिदेशक को भेजी जाए, ताकि भविष्य में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सख्ती से पालन हो।

Case Title: Lallan Kumar Yadav vs State of Bihar & Ors.

Case No.: Criminal Writ Jurisdiction Case No. 1049 of 2021

Decision Date: 13 February 2026

More Stories