दिल्ली हाईकोर्ट ने न्यायिक व्यवस्था की पदानुक्रमीय संरचना पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि उच्च अदालत द्वारा किसी ट्रायल कोर्ट के आदेश को संशोधित या निरस्त करना संबंधित न्यायिक अधिकारी की योग्यता या ईमानदारी पर टिप्पणी नहीं माना जा सकता।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्णा कांत शर्मा ने संजय कुमार सैन बनाम राज्य (NCT of Delhi) मामले में दी। अदालत एक ऐसे आवेदन पर सुनवाई कर रही थी जिसमें एक न्यायिक अधिकारी ने पहले दिए गए फैसले में कथित प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूर्व निर्णय में न्यायिक अधिकारी की क्षमता, ईमानदारी या व्यक्तिगत आचरण पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी और इसलिए आदेश को वापस लेने या टिप्पणियों को हटाने की आवश्यकता नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला उस फैसले से जुड़ा है जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट ने 1 मार्च 2023 को एक रिट याचिका का निपटारा किया था। उस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ की गई कुछ टिप्पणियों को हाईकोर्ट ने अनुचित मानते हुए हटाया था।
इसके बाद संबंधित ट्रायल कोर्ट के न्यायिक अधिकारी ने हाईकोर्ट में एक रिकॉल आवेदन दाखिल किया।
आवेदन में कहा गया कि 1 मार्च 2023 के फैसले में उनके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियाँ की गईं, जिससे उनकी सेवा रिकॉर्ड और प्रतिष्ठा पर असर पड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि यह निर्णय बिना उन्हें सुनवाई का अवसर दिए पारित कर दिया गया था।
इसके अतिरिक्त, यह भी तर्क दिया गया कि फैसले के बाद उसे न्यायिक अधिकारियों के बीच प्रसारित किया गया, जिससे उनकी छवि प्रभावित हुई।
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रिकॉल आवेदन की ओर से दलील दी गई कि:
- मूल निर्णय बिना नोटिस जारी किए पारित किया गया था।
- ट्रायल कोर्ट के आदेशों का पूरा रिकॉर्ड अदालत के सामने नहीं था।
- ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश आरोपी के लंबे समय से हिरासत में होने और शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पारित किए थे।
आवेदक ने यह भी कहा कि उक्त फैसले के बाद उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) को डाउनग्रेड किया गया और उनका स्थानांतरण भी हुआ, जिससे उन्हें गंभीर नुकसान हुआ।
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में न्यायिक पदानुक्रम के सिद्धांत को विस्तार से समझाया।
अदालत ने कहा:
“किसी ट्रायल कोर्ट के आदेश को उच्च अदालत द्वारा संशोधित या निरस्त करना न्यायिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है और इससे संबंधित न्यायिक अधिकारी की क्षमता या ईमानदारी पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।”
अदालत ने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय जब किसी आदेश को रद्द करता है तो वह केवल उस आदेश की वैधता और कानूनीता की जांच करता है, न कि उस आदेश देने वाले न्यायाधीश की व्यक्तिगत क्षमता की।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय सोनू अग्निहोत्री बनाम चन्द्रशेखर का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि उच्च अदालतें आदेशों की आलोचना कर सकती हैं, लेकिन न्यायिक अधिकारियों की व्यक्तिगत आलोचना से बचना चाहिए।
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अदालत ने पाया कि 1 मार्च 2023 के फैसले में किसी भी स्थान पर संबंधित न्यायिक अधिकारी का नाम नहीं लिया गया था और केवल “ट्रायल कोर्ट” शब्द का प्रयोग किया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि:
- पूर्व फैसले में न्यायिक अधिकारी की क्षमता या ईमानदारी पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी।
- आदेश केवल रिट याचिका के निपटारे के संदर्भ में दिया गया था।
- इसलिए फैसले को वापस लेने या टिप्पणियाँ हटाने का कोई आधार नहीं है।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि पूर्व फैसले की टिप्पणियों को संबंधित न्यायिक अधिकारी के ACR या सेवा मूल्यांकन में प्रतिकूल टिप्पणी के रूप में नहीं माना जाएगा।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने रिकॉल आवेदन का निपटारा कर दिया।
Case Title: Sanjay Kumar Sain v. State of NCT of Delhi
Case Number: W.P.(CRL.) 76/2023
Judgment pronounced: 11 March 2026










