चेन्नई की सर्द सुबह में जब मामला पुकारा गया, कोर्टरूम में असामान्य सन्नाटा था। मामला था कथित भर्ती घोटाले का-2,538 पद, करोड़ों की रिश्वत और एक केंद्रीय एजेंसी की रिपोर्ट।
मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन शामिल थे, ने इस संवेदनशील मामले पर अपना फैसला सुनाया।
20 फरवरी 2026 को सुनाए गए आदेश में अदालत ने साफ कहा-यदि सूचना से संज्ञेय अपराध (ऐसा अपराध जिसमें पुलिस सीधे मामला दर्ज कर सकती है) झलकता है, तो FIR दर्ज करना अनिवार्य है।
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मामले की पृष्ठभूमि
दो याचिकाएं दाखिल हुईं। पहली जनहित याचिका थी, जिसे अदालत ने याचिकाकर्ता की पृष्ठभूमि देखते हुए खारिज कर दिया। दूसरी याचिका एक राज्यसभा सांसद और अधिवक्ता द्वारा दायर की गई थी।
आरोप था कि नगर प्रशासन एवं जल आपूर्ति विभाग (MAWS) में 2,538 पदों-असिस्टेंट इंजीनियर, जूनियर इंजीनियर और टाउन प्लानिंग ऑफिसर-की भर्ती में भारी अनियमितता हुई।
दावा किया गया कि प्रत्येक पद के लिए 25 से 35 लाख रुपये तक की अवैध वसूली हुई।
मामले ने तब तूल पकड़ा जब Directorate of Enforcement (ED) ने एक अलग बैंक धोखाधड़ी जांच के दौरान तलाशी में कथित तौर पर भर्ती घोटाले से जुड़े दस्तावेज और डिजिटल रिकॉर्ड जब्त किए। बाद में 27 अक्टूबर 2025 को ED ने यह जानकारी राज्य पुलिस को भेजी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि इतनी गंभीर सामग्री मिलने के बावजूद पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की।
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कोर्ट में बहस
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील ने दलील दी, “जब ED जैसी वैधानिक एजेंसी ने 232 पन्नों की सामग्री साझा की है, तो पुलिस को तुरंत FIR दर्ज करनी चाहिए थी। प्रारंभिक जांच (preliminary enquiry) के नाम पर देरी नहीं की जा सकती।”
राज्य की ओर से एडवोकेट जनरल ने कहा कि सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (DVAC) को जांच सौंपी गई है और अनुमति लेकर प्रारंभिक जांच चल रही है। उनका तर्क था कि भ्रष्टाचार मामलों में पहले प्रारंभिक जांच की जा सकती है।
अदालत की अहम टिप्पणियाँ
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले Lalita Kumari v. Government of U.P. का हवाला दिया। अदालत ने दोहराया कि यदि सूचना में संज्ञेय अपराध का संकेत है, तो FIR दर्ज करना अनिवार्य है।
पीठ ने कहा, “पुलिस अधिकारी यह कहकर FIR दर्ज करने से नहीं बच सकता कि उसे सूचना की विश्वसनीयता पर संदेह है।”
अदालत ने हाल के निर्णयों-
- State of Karnataka v. T.N. Sudhakar Reddy
- State of Karnataka v. Sri Channakeshava H.D.
- Pradeep Nirankarnath Sharma v. State of Gujarat
-का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार मामलों में प्रारंभिक जांच “अनिवार्य शर्त” नहीं है।
बेंच ने कहा, “प्रारंभिक जांच का उद्देश्य केवल यह देखना है कि क्या संज्ञेय अपराध का संकेत है। इसे अनिश्चितकाल तक खींचा नहीं जा सकता।”
अदालत ने यह भी माना कि ED द्वारा साझा की गई सामग्री, भले ही मूल बैंक धोखाधड़ी मामला रद्द हो गया हो, भर्ती घोटाले के आरोपों से अलग है और उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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जनहित याचिका पर रुख
पहली याचिका को अदालत ने याचिकाकर्ता के आपराधिक मामलों की पृष्ठभूमि देखते हुए खारिज कर दिया।
पीठ ने कहा कि “जब याचिकाकर्ता की अपनी साख पर सवाल हो, तो जनहित याचिका पर गंभीर विचार नहीं किया जा सकता।”
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अंतिम निर्णय
डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि सांसद द्वारा दायर याचिका विचार योग्य है और मामले के तथ्यों के आधार पर FIR दर्ज करना आवश्यक है।
अदालत ने निर्देश दिया कि यदि उपलब्ध सामग्री से संज्ञेय अपराध का प्रथम दृष्टया संकेत मिलता है, तो कानून के अनुसार FIR दर्ज कर जांच आगे बढ़ाई जाए।
Case Title: K. Athinarayanan v. State of Tamil Nadu & I.S. Inbadurai v. State of Tamil Nadu
Case No.: W.P.(MD) No.34197 of 2025 & W.P.(Crl.) No.74 of 2026
Decision Date: 20 February 2026










