जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में मंगलवार को एक दिलचस्प सुनवाई हुई। मामला एक ट्रैक्टर के कथित लूट और उसके स्वामित्व विवाद से जुड़ा था। अदालत के सामने सवाल था - क्या मजिस्ट्रेट धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश देते समय ट्रैक्टर की जब्ती का सशर्त निर्देश दे सकता है, खासकर जब मालिकाना हक़ को लेकर सिविल विवाद लंबित हो?
न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी ने साफ कहा, “मजिस्ट्रेट का अधिकार सीमित है। वह इस स्तर पर टाइटल और स्वामित्व का फैसला नहीं कर सकता।”
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मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ठाकुरदास यादव ने सत्र न्यायालय, टीकमगढ़ के आदेश को चुनौती दी थी। निचली अदालत ने 22 नवंबर 2024 को पारित आदेश में कहा था कि यदि ट्रैक्टर शिकायतकर्ता के नाम पर पाया जाता है तो उसे जब्त कर थाना परिसर में रखा जाए और रिपोर्ट कोर्ट में पेश की जाए। इस आदेश को सत्र न्यायालय ने भी 16 दिसंबर 2024 को बरकरार रखा था ।
शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि 6 जुलाई 2023 को जब वे अपनी बहन के घर जा रहे थे, तब याचिकाकर्ता और अन्य लोगों ने उन्हें ट्रैक्टर से नीचे धक्का देकर वाहन छीन लिया। इस पर लूट (IPC की धारा 392/34) का आरोप लगाया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ट्रैक्टर के स्वामित्व को लेकर गंभीर और वास्तविक विवाद है, जो सिविल कोर्ट में लंबित है। उनका कहना था कि बिक्री की रकम लेने के बावजूद शिकायतकर्ता ने ट्रैक्टर उनके नाम ट्रांसफर नहीं किया। ऐसे में आपराधिक कार्यवाही की आड़ में सिविल अधिकारों का फैसला नहीं किया जा सकता।
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अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने धारा 156(3) की सीमा पर विस्तार से चर्चा की। यह प्रावधान मजिस्ट्रेट को पुलिस जांच का निर्देश देने की शक्ति देता है, लेकिन केवल तब जब प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनता हो।
न्यायमूर्ति जोशी ने कहा, “इस स्तर पर मजिस्ट्रेट को केवल यह देखना होता है कि क्या आरोप जांच योग्य हैं। टाइटल या सिविल अधिकारों का निर्णय करना उसका काम नहीं है।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि “यदि आदेश इस आधार पर है कि पहले यह तय किया जाए कि ट्रैक्टर किसके नाम है, तब ही जब्ती होगी, तो यह स्वामित्व के निर्धारण की पूर्वधारणा बन जाती है, जो इस प्रक्रिया से बाहर है।”
कोर्ट ने माना कि जब सिविल अदालत में मालिकाना हक़ का विवाद लंबित है, तब आपराधिक अदालत को संयम बरतना चाहिए ताकि सिविल अधिकारों के निर्णय पर असर न पड़े।
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पुलिस की भूमिका पर स्पष्टता
अदालत ने यह भी कहा कि जब्ती की शक्ति जांच एजेंसी के पास होती है। यदि जांच का आदेश दिया जाता है, तो पुलिस अपने वैधानिक अधिकारों के तहत कार्रवाई कर सकती है।
लेकिन मजिस्ट्रेट, जांच के प्रारंभिक चरण में, इस तरह का सशर्त आदेश जारी नहीं कर सकता जो स्वामित्व विवाद को प्रभावित करे।
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अंतिम निर्णय
सभी दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने 22 नवंबर 2024 और 16 दिसंबर 2024 के आदेशों को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जहां ट्रैक्टर की सशर्त जब्ती का निर्देश दिया गया था ।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट धारा 156(3) के आवेदन पर केवल यह देखे कि क्या संज्ञेय अपराध बनता है। यदि जांच होती है, तो पुलिस अपने अधिकारों का स्वतंत्र रूप से उपयोग करेगी।
साथ ही, सिविल अदालत ट्रैक्टर के स्वामित्व विवाद का फैसला स्वतंत्र रूप से करेगी, बिना इस आपराधिक आदेश से प्रभावित हुए।
याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की गई।
Case Title: Thakurdas Yadav v. State of Madhya Pradesh & Others
Case No.: MCRC No. 4481 of 2025
Decision Date: 11 February 2026










