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न्यूनतम वेतन से कम कमाई का दावा नहीं चलेगा: पत्नी का अंतरिम गुज़ारा भत्ता बढ़ाकर ₹3,500 करने का दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश

X & Y - दिल्ली उच्च न्यायालय ने अंतरिम भरण-पोषण राशि ₹2,500 से बढ़ाकर ₹3,500 कर दी है, और यह माना है कि धारा 125 सीआरपीसी के मामलों में आय मूल्यांकन में न्यूनतम मजदूरी को मार्गदर्शक माना जाना चाहिए।

Shivam Y.
न्यूनतम वेतन से कम कमाई का दावा नहीं चलेगा: पत्नी का अंतरिम गुज़ारा भत्ता बढ़ाकर ₹3,500 करने का दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश

दिल्ली हाईकोर्ट ने अंतरिम गुज़ारा भत्ता (मेंटेनेंस) से जुड़े एक मामले में साफ कहा है कि पति अपनी वास्तविक आय छिपाकर पत्नी के वैध हक़ से बच नहीं सकता। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए पत्नी को मिलने वाली अंतरिम राशि ₹2,500 से बढ़ाकर ₹3,500 प्रति माह कर दी।

यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट की एकल पीठ न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने पत्नी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता पत्नी अर्शी परवीन और प्रतिवादी पति मकसूद उर्फ सोनू की शादी 27 जून 2021 को मुस्लिम रीति-रिवाजों से उत्तर प्रदेश में हुई थी। इस विवाह से कोई संतान नहीं हुई।

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पत्नी का आरोप था कि शादी के तुरंत बाद उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और 10 जून 2022 को मारपीट कर उसे ससुराल से बाहर निकाल दिया गया। उसने कहा कि वह केवल 11वीं तक पढ़ी है, गृहिणी है और उसकी कोई आय या संपत्ति नहीं है।

पत्नी ने फरवरी 2023 में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत गुज़ारा भत्ते की याचिका दायर की थी।

फैमिली कोर्ट का आदेश

शाहदरा स्थित फैमिली कोर्ट ने 6 मार्च 2024 को पत्नी को ₹2,500 प्रति माह अंतरिम गुज़ारा भत्ता देने का आदेश दिया था। कोर्ट ने पति के इस दावे को ध्यान में रखा था कि वह एक एनजीओ में काम करता है और केवल ₹10,000 प्रति माह कमाता है।

इस आदेश से असंतुष्ट होकर पत्नी ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया।

पत्नी की दलीलें

पत्नी की ओर से दलील दी गई कि ₹2,500 की राशि बेहद कम है और उससे बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी नहीं हो सकतीं। यह भी कहा गया कि पति स्नातक है और उसकी आय न्यूनतम वेतन से भी कम बताई जा रही है, जबकि उसने पूरे बैंक स्टेटमेंट भी कोर्ट में दाखिल नहीं किए।

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पत्नी ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राजनेश बनाम नेहा फैसले के सिद्धांतों का सही तरीके से पालन नहीं किया।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियाँ

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पति का यह कहना कि पत्नी काम कर रही है, बिना किसी दस्तावेज़ी सबूत के स्वीकार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा,

“केवल यह कह देना कि पत्नी कमा रही है, पर्याप्त नहीं है। जब तक इसका कोई ठोस प्रमाण न हो, ऐसी दलील स्वीकार नहीं की जा सकती।”

पति की आय पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक स्नातक व्यक्ति की आय न्यूनतम वेतन से भी कम बताना संदेह पैदा करता है, खासकर तब जब पूरे बैंक रिकॉर्ड पेश नहीं किए गए हों।

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कोर्ट का निर्णय

न्यायालय ने पाया कि पति उत्तर प्रदेश में रहकर काम कर रहा है और संबंधित अवधि में वहां कुशल श्रेणी के श्रमिक के लिए न्यूनतम वेतन लगभग ₹13,200 प्रति माह था। इसी आधार पर पति की आय का आकलन किया गया।

अंततः कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई राशि कम है और इसमें संशोधन ज़रूरी है।

कोर्ट ने आदेश दिया कि पत्नी को ₹3,500 प्रति माह अंतरिम गुज़ारा भत्ता दिया जाएगा, जो धारा 125 की याचिका दायर करने की तारीख से लागू होगा। पहले से दी गई राशि का समायोजन किया जाएगा और बकाया रकम तीन महीने में चुकानी होगी।

यह भी स्पष्ट किया गया कि यह आदेश केवल अंतरिम गुज़ारा भत्ते तक सीमित है और इससे मुख्य मुकदमे के गुण-दोष प्रभावित नहीं होंगे।

Case Title: X & Y

Case Number: CRL.REV.P. 763/2024

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