पटना हाईकोर्ट ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOCL) की रिटेल आउटलेट डीलरशिप से जुड़े लंबे विवाद पर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि आवेदन की अंतिम तिथि तक किसी उम्मीदवार के खिलाफ केवल आपराधिक मामला लंबित था, लेकिन आरोप तय (चार्ज फ्रेम) नहीं हुए थे, तो उसे अपने आप अयोग्य नहीं माना जा सकता।
यह फैसला मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने लेटर्स पेटेंट अपील संख्या 140/2025 में सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की जड़ वर्ष 1999 के उस विज्ञापन में है, जिसमें बक्सर जिले के ब्रह्मपुर क्षेत्र के लिए SKO/LDO डीलरशिप के आवेदन आमंत्रित किए गए थे। चयन प्रक्रिया में प्रतिवादी संख्या 10 को प्रथम स्थान मिला था, जबकि अपीलकर्ता दूसरे स्थान पर रहे।
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अपीलकर्ता का आरोप था कि चयनित अभ्यर्थी ने आवेदन पत्र और 2008 में दिए गए शपथ पत्र में यह नहीं बताया कि उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित था। उनका कहना था कि यह “तथ्यों का दमन” है और इससे पूरी चयन प्रक्रिया अवैध हो जाती है।
अदालत में क्या दलीलें दी गईं?
अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि विज्ञापन की शर्तों के अनुसार, यदि किसी के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित है या अदालत द्वारा आरोप तय किए गए हैं, तो यह जानकारी देना अनिवार्य था। उन्होंने कहा, “झूठा शपथ पत्र चयन की जड़ को ही प्रभावित करता है।”
दूसरी ओर, चयनित अभ्यर्थी और IOCL की ओर से कहा गया कि आवेदन की अंतिम तिथि तक उनके खिलाफ आरोप तय नहीं हुए थे और न ही कोई सजा हुई थी। इसलिए वे अयोग्य नहीं थीं। यह भी बताया गया कि संबंधित मामला किशोर न्याय बोर्ड में चला और अंततः 2020 में उन्हें बरी कर दिया गया।
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अदालत की मुख्य टिप्पणियाँ
पीठ ने अपने विस्तृत निर्णय में कहा कि अयोग्यता से जुड़ी शर्तों की “सख्त व्याख्या” की जानी चाहिए। अदालत ने कहा:
“केवल प्राथमिकी दर्ज होना या मामला लंबित होना अपने आप में अयोग्यता नहीं है, जब तक कि विज्ञापन में स्पष्ट रूप से ऐसा न कहा गया हो।”
अदालत ने यह भी माना कि विज्ञापन ही चयन प्रक्रिया का मूल दस्तावेज होता है। यदि आवेदन पत्र में शब्दों का कोई अंतर है, तो भी विज्ञापन की शर्तें ही प्रभावी रहेंगी।
पीठ ने यह भी कहा कि IOCL ने अपीलकर्ता की आपत्तियों पर विचार कर 20 दिसंबर 2017 को एक कारणयुक्त आदेश पारित किया था और उसमें कोई मनमानी या कानूनी त्रुटि नहीं दिखती।
देरी और इक्विटी पर अदालत की राय
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि डीलरशिप कई वर्षों से संचालित हो रही है और चयनित अभ्यर्थी ने पर्याप्त निवेश किया है। ऐसे में, लंबी देरी के बाद चयन को रद्द करना न्यायसंगत नहीं होगा।
फैसले में कहा गया:
“विलंब और स्थापित व्यावसायिक व्यवस्था को देखते हुए, राहत देना न्यायसंगत नहीं होगा।”
अंतिम निर्णय
सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि एकल न्यायाधीश के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। अदालत ने कहा कि न तो चयन प्रक्रिया में कोई स्पष्ट अवैधता है और न ही IOCL के निर्णय में मनमानी।
अंततः, लेटर्स पेटेंट अपील खारिज कर दी गई। किसी पक्ष पर लागत नहीं लगाई गई।
Case Title: Binod Kumar Mishra v. Indian Oil Corporation Ltd. & Ors.
Case No.: Letters Patent Appeal No. 140 of 2025
Decision Date: 20 February 2026










