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सुकिंदा चुनाव विवाद पर ओडिशा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, याचिका प्रारंभिक चरण में खारिज

प्रीतिरंजन घराई बनाम प्रदीप बाल सामंत - उड़ीसा उच्च न्यायालय ने सुकिंदा विधायक की चुनाव याचिका खारिज करते हुए कहा कि आरपीए 1951 के तहत गैर-खुलासा और शिक्षा संबंधी दावों में पर्याप्त तथ्य नहीं थे।

Shivam Y.
सुकिंदा चुनाव विवाद पर ओडिशा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, याचिका प्रारंभिक चरण में खारिज

कटक में गुरुवार 27 फरवरी को उड़ीसा उच्च न्यायालय ने 54-सुकिंदा विधानसभा सीट से जुड़े चुनाव विवाद पर अपना फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति सशिकांत मिश्रा की एकल पीठ ने एक अंतरिम आवेदन स्वीकार करते हुए पूरी चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया।

मामला वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव से जुड़ा था, जिसमें प्रत्याशी की जीत को चुनौती दी गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

चुनाव याचिका में विजयी उम्मीदवार की जीत को यह कहते हुए चुनौती दी गई कि उन्होंने नामांकन पत्र के साथ दाखिल शपथपत्र (Form-26) में दो लंबित आपराधिक मामलों का खुलासा नहीं किया और अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे में गलत जानकारी दी।

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रिकॉर्ड के अनुसार, संबंधित प्रत्याशी ने 9,577 मतों के अंतर से जीत दर्ज की थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि यदि मतदाताओं को सही जानकारी मिलती तो परिणाम अलग हो सकता था।

इसके जवाब में विजयी प्रत्याशी ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के तहत आवेदन दायर कर कहा कि याचिका में ठोस आधार (cause of action) नहीं है और इसे शुरुआत में ही खारिज किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने लंबी बहस की। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि आवेदन देर से दाखिल हुआ है और मुकदमे को टालने की कोशिश है।

लेकिन अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि आदेश 7 नियम 11 के तहत आवेदन किसी भी चरण में सुना जा सकता है।

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पीठ ने कहा,

“यदि याचिका में प्रारंभ से ही कारण-कार्रवाई (cause of action) नहीं बनता, तो अनावश्यक सुनवाई का कोई औचित्य नहीं है।”

अदालत ने पहले उस आरोप पर विचार किया जिसमें दो लंबित मामलों के खुलासे न करने की बात कही गई थी। ये मामले भुगतान वेतन अधिनियम, 1936 से जुड़े थे।

न्यायालय ने Representation of the People Act, 1951 की धारा 33-A का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल वही आपराधिक मामले अनिवार्य रूप से घोषित किए जाने चाहिए जिनमें दो वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो और जिनमें आरोप तय हो चुके हों।

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पीठ ने पाया कि संबंधित अधिनियम के तहत अधिकतम सजा इस सीमा तक नहीं पहुंचती। इसलिए अदालत ने माना कि ऐसे मामलों का खुलासा अनिवार्य श्रेणी में नहीं आता।

अदालत ने कहा,

“केवल लंबित कार्यवाही होना पर्याप्त नहीं है; वह वैधानिक दायरे में आना चाहिए।”

याचिका में यह भी कहा गया था कि प्रत्याशी ने हाईस्कूल उत्तीर्ण होने का गलत दावा किया।

लेकिन अदालत ने पाया कि इस आरोप के समर्थन में कोई आधिकारिक रिकॉर्ड, प्रमाणपत्र या सक्षम प्राधिकरण का पत्र पेश नहीं किया गया।

पीठ ने टिप्पणी की,

“चुनाव याचिका में ठोस और विशिष्ट तथ्य होना आवश्यक है। केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर आरोप नहीं टिक सकते।”

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अदालत ने यह भी कहा कि यह नहीं बताया गया कि कथित गलत घोषणा से चुनाव परिणाम कैसे “सार्थक रूप से प्रभावित” हुआ।

सभी दलीलों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याचिका में आवश्यक “मटेरियल फैक्ट्स” नहीं हैं और यह मुकदमे योग्य मुद्दा (triable issue) प्रस्तुत नहीं करती।

अंत में अदालत ने अंतरिम आवेदन स्वीकार करते हुए चुनाव याचिका को कारण-कार्रवाई के अभाव में खारिज कर दिया।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि आदेश की प्रति निर्वाचन आयोग और विधानसभा अध्यक्ष को भेजी जाए।

Case Title: Pritiranjan Gharai v. Pradeep Bal Samant

Case Number: I.A. No. 51 of 2025 (arising out of ELPET No. 6 of 2024)

Date of Judgment: 27 February 2026

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