सुप्रीम कोर्ट ने गारंटर (जमानतदार) की जिम्मेदारी को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा कि यदि बैंक और उधारकर्ता के बीच बिना गारंटर की जानकारी के शर्तों में बदलाव होता है, तो गारंटर केवल मूल स्वीकृत राशि तक ही जिम्मेदार होगा, उससे अधिक नहीं।
यह फैसला भग्यलक्ष्मी को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड की अपील पर आया, जिसमें बैंक ने गारंटरों से पूरी बकाया राशि वसूलने की मांग की थी।
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मामले की पृष्ठभूमि
साल 1993 में एक फर्म ने बैंक से ₹4 लाख की कैश-क्रेडिट सुविधा ली। इस लोन के लिए दो व्यक्तियों ने गारंटर के रूप में अनुबंध पर हस्ताक्षर किए।
बैंक का आरोप था कि उधारकर्ता ने बैंक के कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत से स्वीकृत राशि से कहीं अधिक रकम निकाल ली। बाद में जब लोन की अदायगी नहीं हुई, तो बैंक ने लगभग ₹26.95 लाख की वसूली के लिए मुकदमा दायर किया।
शुरुआत में निचली प्राधिकरण ने केवल मुख्य उधारकर्ता को जिम्मेदार ठहराया। लेकिन अपील में सहकारी ट्रिब्यूनल ने गारंटरों को ₹4 लाख तक जिम्मेदार माना।
इसके बाद गारंटर गुजरात हाईकोर्ट पहुँचे। हाईकोर्ट ने कहा कि या तो गारंटर पूरी राशि के लिए जिम्मेदार होंगे या बिल्कुल नहीं - बीच का रास्ता नहीं हो सकता। इस आधार पर ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द कर दिया गया।
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सुप्रीम कोर्ट में बहस
बैंक की ओर से दलील दी गई कि भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 133 के अनुसार, यदि बिना गारंटर की सहमति के अनुबंध की शर्तों में बदलाव होता है, तो गारंटर केवल उस बदलाव के बाद की देनदारी से मुक्त होता है।
वहीं गारंटरों की ओर से कहा गया कि धारा 139 के तहत यदि बैंक का आचरण गारंटर के अधिकारों को नुकसान पहुँचाता है, तो वह पूरी तरह मुक्त हो जाता है।
अदालत की टिप्पणी
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरथना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने विस्तार से दोनों धाराओं की व्याख्या की।
पीठ ने कहा, “धारा 133 स्पष्ट करती है कि बिना गारंटर की सहमति के अनुबंध में बदलाव होने पर, गारंटर केवल उस बदलाव के बाद की लेन-देन के लिए जिम्मेदार नहीं रहेगा।”
अदालत ने आगे कहा कि हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष गलत था कि गारंटर या तो पूरी राशि के लिए जिम्मेदार होगा या बिल्कुल नहीं।
“कानून स्वयं यह विभाजन (बिफरकेशन) करता है। गारंटर की जिम्मेदारी केवल उस सीमा तक रहेगी, जिसके लिए उसने सहमति दी थी,” पीठ ने स्पष्ट किया।
धारा 139 क्यों लागू नहीं हुई
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में धारा 139 लागू नहीं होती। अदालत के अनुसार, धारा 139 तब लागू होती है जब लेनदार का कोई कार्य गारंटर के भविष्य के कानूनी उपाय (remedy) को बाधित कर दे।
यहाँ अदालत ने पाया कि भले ही बैंक ने अधिक रकम निकालने दी, लेकिन इससे गारंटर का उधारकर्ता के खिलाफ कानूनी अधिकार प्रभावित नहीं हुआ।
पीठ ने कहा, “यह स्थापित सिद्धांत है कि लेनदार को पहले मुख्य उधारकर्ता के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। वह सीधे गारंटर से वसूली कर सकता है।”
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अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट का 25 जून 2008 का आदेश रद्द कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि गारंटर केवल ₹4 लाख की मूल स्वीकृत राशि और उस पर लागू ब्याज तक जिम्मेदार होंगे। स्वीकृत सीमा से अधिक निकाली गई रकम के लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं।
अपील स्वीकार करते हुए अदालत ने पक्षकारों को अपने-अपने खर्च वहन करने का निर्देश दिया।
Case Title: Bhagyalaxmi Co-Operative Bank Ltd. v. Babaldas Amtharam Patel (D) Through LRs & Ors.
Case No.: Civil Appeal No. 3200 of 2016
Decision Date: 27 February 2026










