नई दिल्ली में मंगलवार को हुई अहम सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि जब कंपनी के पुनरुद्धार की बात हो, तो Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) को प्राथमिकता दी जाएगी। अदालत ने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कॉरपोरेट इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) को रोक दिया गया था।
यह मामला Omkara Assets Reconstruction Private Limited बनाम अमित चतुर्वेदी व अन्य से जुड़ा है, जिसमें कंपनियों अधिनियम, 1956 के तहत लंबित स्कीम ऑफ अरेंजमेंट (SOA) और IBC की कार्यवाही के बीच टकराव का सवाल उठा।
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मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता ने IBC की धारा 7 के तहत आवेदन दाखिल कर कॉरपोरेट देनदार के खिलाफ CIRP शुरू करने की मांग की थी। दावा किया गया कि कंपनी पर मूल ऋण और ब्याज मिलाकर 154 करोड़ रुपये से अधिक बकाया है।
दूसरी ओर, कंपनी ने तर्क दिया कि कंपनियों अधिनियम की धारा 391-394 के तहत पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में एक स्कीम ऑफ अरेंजमेंट पहले से लंबित है, इसलिए IBC की कार्यवाही नहीं चलाई जानी चाहिए।
NCLT ने IBC के तहत प्रक्रिया शुरू कर दी और मोराटोरियम लागू करते हुए अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) नियुक्त किया। लेकिन NCLAT ने इसे रोकते हुए कहा कि हाईकोर्ट की कार्यवाही पहले पूरी होनी चाहिए।
अदालत की प्रमुख टिप्पणियां
न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने रिकॉर्ड का विस्तृत परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि स्कीम ऑफ अरेंजमेंट समयसीमा के अनुसार लागू नहीं की गई थी।
पीठ ने कहा,
“न्यायिक अनुशासन महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे ऐसे पक्षकारों के लिए ढाल नहीं बनाया जा सकता जो सार्वजनिक धन को जोखिम में डाल रहे हों।”
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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि IBC की धारा 238 के अनुसार, यदि किसी अन्य कानून से टकराव हो, तो IBC को प्राथमिकता मिलेगी।
कोर्ट ने नोट किया कि स्कीम के लिए दूसरी अर्जी (सेकेंड मोशन) निर्धारित समय में दाखिल नहीं की गई। यहां तक कि 2019 में स्वीकृति के बाद भी आदेश को रजिस्ट्रार के समक्ष तय समय में दाखिल नहीं किया गया।
अदालत ने कहा कि 2008 की स्कीम, 2019 या 2023 में व्यावहारिक रूप से लागू नहीं मानी जा सकती।
IBC की प्रधानता पर सुप्रीम कोर्ट का रुख
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि IBC एक विशेष कानून है, जिसका उद्देश्य कंपनी को पुनर्जीवित करना है।
फैसले में कहा गया कि
“जब तक कंपनी की मृत्यु अपरिहार्य न हो, हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए कि उसे पुनर्जीवित किया जाए।”
कोर्ट ने माना कि IBC की कार्यवाही स्वतंत्र प्रकृति की होती है और इसे केवल इस आधार पर रोका नहीं जा सकता कि किसी अन्य मंच पर अलग कार्यवाही लंबित है।
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अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने NCLAT का आदेश रद्द कर दिया और NCLT द्वारा शुरू की गई CIRP कार्यवाही को बहाल कर दिया।
IRP को आगे की प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दी गई। पहले दिया गया अंतरिम निर्देश, जिसमें प्रबंधन को दैनिक कार्यों में शामिल रहने की छूट दी गई थी, उसे भी समाप्त कर दिया गया।
अदालत ने कहा कि अपील स्वीकार की जाती है और लंबित सभी आवेदन भी निपटाए जाते हैं।
Case Title: Omkara Assets Reconstruction Private Limited v. Amit Chaturvedi & Ors.
Case No.: Civil Appeal No. 11417 of 2025
Decision Date: 24 February 2026










