नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की खचाखच भरी अदालत में गुरुवार को एक अहम सवाल पर अंतिम मुहर लग गई - क्या एक ही कर्ज के लिए मूल कर्जदार (Principal Borrower) और उसके कॉरपोरेट गारंटर के खिलाफ एक साथ दिवाला प्रक्रिया (CIRP) शुरू की जा सकती है?
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि कानून इसकी अनुमति देता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक कर्ज और डिफॉल्ट साबित है, तब तक कार्यवाही पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
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मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद कई अपीलों के जरिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। प्रमुख मामला ICICI Bank Limited बनाम ERA Infrastructure (India) Limited से जुड़ा था।
बैंकों ने अलग-अलग मामलों में यह दलील दी थी कि जब कर्जदार और गारंटर दोनों की जिम्मेदारी सह-विस्तृत (co-extensive) है, तो वे दोनों के खिलाफ अलग-अलग या साथ में IBC के तहत कार्यवाही शुरू कर सकते हैं।
हालांकि, कुछ मामलों में NCLT और NCLAT ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिए थे कि “एक ही कर्ज के लिए दो बार CIRP नहीं चल सकती।”
अदालत की मुख्य टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने पहले के अपने फैसले BRS Ventures Investments Ltd. v. SREI Infrastructure Finance Ltd. का हवाला देते हुए कहा कि यह मुद्दा अब नया नहीं रहा।
पीठ ने कहा:
“आईबीसी की धारा 60(2) यह स्पष्ट करती है कि कॉरपोरेट डेब्टर और उसके गारंटर के खिलाफ अलग या साथ में कार्यवाही की जा सकती है।”
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अदालत ने यह भी दोहराया कि भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 128 के तहत गारंटर की जिम्मेदारी मूल कर्जदार के बराबर होती है।
क्या IBC सिर्फ वसूली का जरिया है?
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि IBC को वसूली का साधन नहीं बनाया जा सकता। एक ही कर्ज के लिए कई कंपनियों के खिलाफ कार्यवाही शुरू करना कोड की मंशा के खिलाफ है।
इस पर कोर्ट ने कहा:
“सही है कि IBC केवल वसूली कानून नहीं है, लेकिन यदि डिफॉल्ट और देनदारी सिद्ध है, तो केवल इस आधार पर आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता कि उसका उद्देश्य वसूली हो सकता है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि NCLT को धारा 7 के तहत विवेकाधिकार है, पर वह मनमाने ढंग से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
‘डबल रिकवरी’ पर कोर्ट की राय
सबसे बड़ी चिंता यह जताई गई कि यदि दोनों के खिलाफ कार्यवाही चलेगी तो बैंक एक ही कर्ज की दो बार वसूली कर सकता है।
इस पर पीठ ने कहा कि मौजूदा नियमों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय हैं।
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अदालत ने IBBI विनियम 12A का जिक्र करते हुए कहा:
“यदि किसी स्रोत से आंशिक या पूर्ण वसूली हो जाती है, तो दावे को अपडेट करना अनिवार्य है।”
कोर्ट ने यह भी दोहराया कि किसी भी स्थिति में एक ही रकम दो बार वसूल नहीं की जा सकती।
‘डॉक्ट्रिन ऑफ इलेक्शन’ लागू नहीं
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि बैंक को यह चुनना चाहिए कि वह कर्जदार से वसूली करेगा या गारंटर से।
अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि IBC में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो लेनदार को एक विकल्प तक सीमित करे।
पीठ ने कहा:
“जब कानून ने ऐसा प्रतिबंध नहीं लगाया है, तो न्यायालय ऐसा प्रतिबंध नहीं जोड़ सकता।”
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अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि कॉरपोरेट डेब्टर और गारंटर के खिलाफ एक साथ CIRP शुरू करना कानूनन वैध है।
जहां NCLT या NCLAT ने आवेदन खारिज किए थे, वहां के आदेश रद्द कर दिए गए। वहीं, जिन मामलों में एक साथ कार्यवाही की अनुमति दी गई थी, उन्हें सही ठहराया गया।
अदालत ने किसी अतिरिक्त दिशा-निर्देश या नई व्यवस्था बनाने से इनकार करते हुए कहा कि मौजूदा कानून और विनियम पर्याप्त हैं।
Case Title: ICICI Bank Limited v. ERA Infrastructure (India) Limited & Connected Matters
Case No.: Civil Appeal No. 6094 of 2019 & Batch Matters
Decision Date: February 26, 2026










