लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के एक रेडियोलॉजिस्ट डॉ. नरेश कुमार गर्ग की अपील पर महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। मामला अवैध लिंग निर्धारण के आरोप और PCPNDT Act के तहत दर्ज शिकायत से जुड़ा था।
अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या केवल इस आधार पर पूरी शिकायत रद्द की जा सकती है कि छापा मारने का आदेश जिला उपयुक्त प्राधिकारी (District Appropriate Authority) के सभी सदस्यों की सामूहिक मंजूरी से नहीं हुआ था।
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मामले की पृष्ठभूमि
डॉ. नरेश कुमार गर्ग के खिलाफ 17 सितंबर 2015 को गुरुग्राम में एक कथित स्टिंग ऑपरेशन के बाद कार्रवाई शुरू हुई। शिकायत थी कि एक गर्भवती महिला का अवैध रूप से लिंग परीक्षण किया गया।
पुलिस ने एफआईआर दर्ज की, लेकिन जांच के बाद ट्रायल कोर्ट ने 28 अक्टूबर 2015 को डॉ. गर्ग को डिस्चार्ज कर दिया। पुलिस ने कहा कि उनके खिलाफ लिंग बताने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला।
हालांकि, बाद में जिला सलाहकार समिति ने PCPNDT Act के तहत अलग से शिकायत दायर करने की सिफारिश की। 18 सितंबर 2018 को अधिकृत अधिकारी ने औपचारिक शिकायत दर्ज की, जिस पर मजिस्ट्रेट ने समन जारी कर दिया।
डॉ. गर्ग ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर शिकायत और समन आदेश को रद्द करने की मांग की, लेकिन हाईकोर्ट ने 24 जुलाई 2024 को याचिका खारिज कर दी।
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अदालत में मुख्य तर्क
अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि छापे का आदेश जिला उपयुक्त प्राधिकारी के केवल एक सदस्य, यानी सिविल सर्जन ने जारी किया था। कानून के मुताबिक, यह निर्णय सामूहिक होना चाहिए था।
उन्होंने 2024 के एक फैसले Ravinder Kumar बनाम State of Haryana का हवाला देते हुए कहा कि यदि सर्च का आदेश सामूहिक रूप से नहीं लिया गया हो, तो पूरी कार्यवाही अवैध हो जाती है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कहा कि PCPNDT Act एक सामाजिक कल्याण कानून है, जिसका उद्देश्य कन्या भ्रूण हत्या रोकना है। उन्होंने तर्क दिया कि रिकॉर्ड में पाई गई कमियां गंभीर उल्लंघन हैं।
उन्होंने कहा, “रिकॉर्ड का सही रखरखाव कानून का मूल आधार है। यह केवल तकनीकी कमी नहीं मानी जा सकती।”
कोर्ट का अवलोकन
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने विस्तार से PCPNDT Act की धाराओं का विश्लेषण किया। अदालत ने माना कि 17 सितंबर 2015 का आदेश सिविल सर्जन द्वारा जारी किया गया था और रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं था जिससे यह साबित हो कि यह सामूहिक निर्णय था।
अदालत ने कहा, “Section 30 के तहत सर्च का निर्णय सामूहिक रूप से लिया जाना आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो सर्च की वैधता पर प्रश्न उठता है।”
लेकिन पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि मामला यहीं समाप्त नहीं होता।
अदालत ने देखा कि पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर में डिस्चार्ज का आदेश केवल IPC और पुलिस जांच से संबंधित था। PCPNDT Act के तहत शिकायत दायर करने की शक्ति अलग और स्वतंत्र है।
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अदालत ने कहा कि Section 28 के अनुसार, PCPNDT Act के अपराधों का संज्ञान केवल अधिकृत शिकायत पर ही लिया जा सकता है। इसलिए पुलिस डिस्चार्ज का आदेश अपने आप में आगे की वैधानिक शिकायत को नहीं रोकता।
पीठ ने यह भी दोहराया कि FOGSI बनाम Union of India मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि Form F का पूरा और सही तरीके से भरना अनिवार्य है, और इसमें कमी गंभीर उल्लंघन मानी जाएगी।
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि भले ही सर्च की वैधता पर प्रश्न हो, लेकिन शिकायत स्वतंत्र रूप से दाखिल की गई थी और मजिस्ट्रेट द्वारा समन जारी करना कानून के दायरे में था।
अदालत ने कहा कि इस स्तर पर शिकायत को रद्द करना उचित नहीं होगा, क्योंकि रिकॉर्ड में उल्लंघन के प्रथम दृष्टया संकेत मौजूद हैं।
इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और शिकायत कार्यवाही जारी रखने का मार्ग प्रशस्त किया।
Case Title: Dr. Naresh Kumar Garg v. State of Haryana & Ors.
Case No.: Criminal Appeal (Arising out of SLP (Criminal) No. 5915 of 2025)
Decision Date: 23-02-2026








