सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में डिबेंचर विवाद से जुड़ी बड़ी राहत देते हुए NCLT और NCLAT के आदेशों को पलट दिया। अदालत ने कहा कि जब कर्ज और डिफॉल्ट स्पष्ट हो, तो दिवाला कार्यवाही शुरू करने से इनकार नहीं किया जा सकता। मामला ₹850 करोड़ के डिबेंचर इश्यू से जुड़ा था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद Catalyst Trusteeship Limited और Ecstasy Realty Pvt. Ltd. के बीच था।
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कंपनी ने मुंबई में एक रेजिडेंशियल-कम-रिटेल प्रोजेक्ट के लिए 850 करोड़ रुपये के नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर जारी करने का प्रस्ताव रखा था। इसमें से 600 करोड़ रुपये के डिबेंचर सब्सक्राइब हुए और राशि कंपनी को दे दी गई।
बाद में कंपनी ने कर्ज चुकाने में राहत और 18 महीने की मोहलत (मोराटोरियम) की मांग की। यह बातचीत मुख्य रूप से ECL Finance Limited के साथ ई-मेल के जरिए हुई।
लेकिन डिबेंचर ट्रस्ट डीड (DTD) के तहत शर्तों में बदलाव के लिए सभी डिबेंचर धारकों की लिखित सहमति जरूरी थी। ऐसा कोई औपचारिक संशोधन नहीं हुआ।
NCLT और NCLAT का रुख
National Company Law Tribunal (NCLT) ने माना कि चूंकि पुनर्गठन पर बातचीत चल रही थी और कुछ भुगतान भी हुए थे, इसलिए डिफॉल्ट स्पष्ट नहीं है।
बाद में National Company Law Appellate Tribunal (NCLAT) ने भी यही कहा कि ट्रस्टी को पुनर्गठन की जानकारी थी और व्यवहार से ऐसा लगता है कि 18 महीने का मोराटोरियम लागू हो चुका था।
इसी आधार पर दिवाला प्रक्रिया शुरू करने से इनकार कर दिया गया।
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सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने इन निष्कर्षों को “तथ्यों और कानून के खिलाफ” बताया।
पीठ ने स्पष्ट कहा,
“Section 7 के तहत आवेदन स्वीकार करने के लिए केवल यह देखना होता है कि वित्तीय ऋण मौजूद है और उसमें डिफॉल्ट हुआ है या नहीं।”
अदालत ने Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 की धारा 7 का हवाला देते हुए कहा कि यहां किसी ‘पूर्व विवाद’ (pre-existing dispute) का सिद्धांत लागू नहीं होता, जैसा कि ऑपरेशनल क्रेडिटर के मामलों में होता है।
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि डिबेंचर ट्रस्ट डीड में संशोधन के लिए विशेष प्रस्ताव (Special Resolution) और लिखित सहमति अनिवार्य थी। ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया।
अदालत ने कहा,
“ई-मेल के आधार पर डीड की शर्तें बदली हुई नहीं मानी जा सकतीं, जब तक निर्धारित प्रक्रिया का पालन न हो।”
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पुनर्गठन की दलील क्यों नहीं मानी गई
कंपनी का कहना था कि उसे 18 महीने की मोहलत मिल चुकी थी और इसलिए डिफॉल्ट नहीं माना जा सकता।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि:
- सभी डिबेंचर धारकों की मंजूरी नहीं ली गई थी।
- ट्रस्टी को शुरुआत में बातचीत की जानकारी ही नहीं थी।
- डीड में संशोधन की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।
अदालत ने कहा कि केवल एक डिबेंचर धारक के साथ बातचीत पूरी व्यवस्था को बाध्य नहीं कर सकती।
NCLAT ने ट्रस्टी पर यह टिप्पणी की थी कि उसने डिफॉल्ट “इंजीनियर” किया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस टिप्पणी को निराधार बताते हुए हटाया और कहा कि ट्रस्टी का कर्तव्य डिबेंचर धारकों के हित की रक्षा करना है, न कि कंपनी के हित की।
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अंतिम फैसला
अदालत ने NCLT (03 फरवरी 2023) और NCLAT (16 अप्रैल 2025) के आदेश रद्द कर दिए।
साथ ही कंपनी याचिका (IB) 922/MB/C-I/2022 को NCLT मुंबई की फाइल में बहाल करते हुए निर्देश दिया कि इसे अलग आदेश से स्वीकार किया जाए और आगे की कार्रवाई कानून के अनुसार की जाए।
इस प्रकार अपील स्वीकार कर ली गई।
Case Title: Catalyst Trusteeship Ltd. v. Ecstasy Realty Pvt. Ltd.
Case No.: Civil Appeal No. 7424 of 2025
Decision Date: 24 February 2026










