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15 दिन में पूरी रकम न जमा होने पर नीलामी रद्द नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा

मेसर्स आदिशक्ति डेवलपर्स बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने 15 दिन में पूरी राशि न जमा होने पर नीलामी रद्द करने का हाईकोर्ट का फैसला पलटा, आदिशक्ति डेवलपर्स को राहत।

Vivek G.
15 दिन में पूरी रकम न जमा होने पर नीलामी रद्द नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा

नई दिल्ली में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र की एक बहुचर्चित जमीन नीलामी विवाद में अहम फैसला सुनाया। मामला मुंबई के चेंबूर स्थित एक प्लॉट की नीलामी से जुड़ा था, जिसे बैंक के बकाया की वसूली के लिए बेचा गया था।

न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि केवल इस आधार पर कि पूरी नीलामी राशि 15 दिन के भीतर जमा नहीं हुई, बिक्री को स्वतः शून्य (अवैध) नहीं माना जा सकता।

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मामले की पृष्ठभूमि

मामला M/s. Adishakti Developers बनाम State of Maharashtra से जुड़ा है। चेंबूर, मुंबई स्थित 810 वर्ग मीटर के प्लॉट को Mahanagar Co-operative Bank Ltd के बकाया की वसूली के लिए नीलाम किया गया था।

बैंक ने साझेदारी फर्म M/s. Borse Brothers को कैश क्रेडिट सुविधा दी थी। भुगतान न होने पर को-ऑपरेटिव कोर्ट ने 1994 में एकतरफा डिक्री पारित की।

इसके बाद 2005 में नीलामी हुई, जिसमें Adishakti Developers ने 1.51 करोड़ रुपये की सबसे ऊंची बोली लगाई। 18 मार्च 2005 को बिक्री की पुष्टि कर दी गई और कब्जा सौंप दिया गया।

विवाद कैसे खड़ा हुआ

दिवंगत पार्टनर पांडित्राव बोरसे के कानूनी उत्तराधिकारियों ने नीलामी को चुनौती दी। उनका मुख्य तर्क था कि नीलामी की पूरी राशि 15 दिनों के भीतर जमा नहीं हुई, जबकि नियम 107(11)(h) के अनुसार ऐसा होना चाहिए था।

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उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें नीलामी की जानकारी समय पर नहीं दी गई और बैंक तथा खरीदार के बीच मिलीभगत की आशंका जताई।

संयुक्त निबंधक (Divisional Joint Registrar) ने देरी को माफ करते हुए नीलामी और बिक्री प्रमाणपत्र रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट का रुख

Bombay High Court ने संयुक्त निबंधक के आदेश को सही ठहराया।

हाईकोर्ट ने माना कि 15 दिनों में पूरी राशि जमा करना अनिवार्य शर्त है। चूंकि रकम किस्तों में और निर्धारित समय से बाद में जमा हुई, इसलिए बिक्री अमान्य मानी गई।

साथ ही, हाईकोर्ट ने कानूनी वारिसों को बकाया राशि जमा करने का अवसर दिया और बैंक को खरीदार को रकम लौटाने का निर्देश दिया।

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सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड की समीक्षा करते हुए कई अहम बिंदुओं पर विचार किया।

पहला, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि को-ऑपरेटिव कोर्ट का 1994 का अवार्ड अंतिम हो चुका था। इसलिए बकाया की वसूली के लिए संपत्ति की नीलामी वैध थी।

दूसरा, अदालत ने माना कि धारा 154 के तहत दायर पुनरीक्षण (revision) याचिका सुनवाई योग्य थी, भले ही नियम 107 के तहत अलग उपाय उपलब्ध था।

सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा था-क्या 15 दिनों में पूरी रकम न जमा होने से नीलामी स्वतः शून्य हो जाती है?

पीठ ने कहा कि नियम 107(11)(h) में शेष राशि 15 दिनों में जमा करने का प्रावधान है, लेकिन यह प्रावधान मुख्यतः वसूली प्रक्रिया की सुचारुता के लिए है।

अदालत ने कहा, “जहां प्रारंभिक 15 प्रतिशत राशि समय पर जमा कर दी गई और शेष राशि बैंक ने स्वीकार कर ली, वहां केवल तकनीकी देरी के आधार पर बिक्री को शून्य घोषित करना उचित नहीं।”

कोर्ट ने यह भी देखा कि बैंक ने रकम स्वीकार की और बिक्री की पुष्टि की।

सरकारी अनुमति का मुद्दा

वारिसों ने तर्क दिया कि संपत्ति पर बिना सरकारी अनुमति के बंधक (मॉर्गेज) नहीं बनाया जा सकता था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब को-ऑपरेटिव कोर्ट का अवार्ड अंतिम हो चुका है और वह सिविल डिक्री के समान प्रभाव रखता है, तो संपत्ति की कुर्की और नीलामी वैध मानी जाएगी।

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अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।

अदालत ने कहा कि नीलामी प्रक्रिया में केवल शेष राशि जमा करने में देरी को आधार बनाकर बिक्री को शून्य नहीं ठहराया जा सकता, विशेषकर जब बैंक ने भुगतान स्वीकार किया हो और बिक्री की पुष्टि कर दी गई हो।

इसके साथ ही, संयुक्त निबंधक और हाईकोर्ट द्वारा नीलामी रद्द करने के आदेश निरस्त कर दिए गए।

Case Title: M/s. Adishakti Developers vs State of Maharashtra & Ors.

Case No.: Civil Appeal Nos. 2545-2548 of 2026 (arising out of SLP (C) Nos. 12343-12346/2018)

Case Type: Civil Appeal

Decision Date: February 26, 2026

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