नागपुर स्थित बॉम्बे हाईकोर्ट की पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत दर्ज मामलों को केवल समझौते के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।
यह मामला एक अधिवक्ता पर लगे आरोपों से जुड़ा था, जिसमें कहा गया था कि उसने एक आरोपी के परिवार से जेल में बेहतर सुविधाएं दिलाने के नाम पर रिश्वत की मांग की थी। अदालत ने कहा कि प्रथमदृष्टया “उकसावे (abetment)” का मामला बनता है और इस स्तर पर हस्तक्षेप उचित नहीं होगा।
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मामले की पृष्ठभूमि
मामला महाराष्ट्र के अकोला जिले के मुर्तिजापुर का है। शिकायतकर्ता राजेश रामदासजी कांबे ने एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) से संपर्क कर आरोप लगाया कि उसके बेटे को एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया गया था।
शिकायत के अनुसार, पुलिस अधिकारियों के माध्यम से जेल में बेहतर सुविधाएं दिलाने के लिए पहले ₹5 लाख की मांग की गई, जो बाद में बातचीत के बाद ₹1.25 लाख पर तय हुई। आरोप है कि यह मांग पुलिस अधिकारियों की ओर से अधिवक्ता सचिन चंद्रमणि वानखेड़े के माध्यम से की गई थी।
ACB ने शिकायत मिलने के बाद सत्यापन पंचनामा तैयार किया और बातचीत की रिकॉर्डिंग भी की। बाद में जांच के दौरान आवेदक का वॉयस सैंपल लिया गया और उसे विश्लेषण के लिए भेजा गया। रिपोर्ट में रिकॉर्ड की गई आवाज और वॉयस सैंपल के बीच मेल पाया गया।
FIR रद्द करने की मांग
आवेदक अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर FIR और उससे जुड़ी कार्यवाही रद्द करने की मांग की।
उनका मुख्य तर्क था कि:
- शिकायतकर्ता और उनके बीच समझौता हो चुका है।
- वे “लोक सेवक” नहीं हैं, इसलिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, 12, और 15 उनके खिलाफ लागू नहीं होती।
- घटना जनवरी 2018 की है, जबकि कानून में संशोधन जुलाई 2018 से लागू हुआ था।
इस आधार पर उन्होंने कहा कि FIR को रद्द किया जाना चाहिए।
राज्य का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि भले ही आरोपित व्यक्ति लोक सेवक न हो, लेकिन यदि उसने किसी लोक सेवक को रिश्वत दिलाने या उसके लिए पैसा मांगने में भूमिका निभाई है तो यह अभियोजन योग्य अपराध है।
सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि:
- शिकायतकर्ता और आवेदक के बीच हुई बातचीत रिकॉर्ड में है।
- वॉयस सैंपल की रिपोर्ट भी आरोपों की पुष्टि करती है।
इसलिए मामले में प्रथम दृष्टया अपराध बनता है और FIR रद्द नहीं की जानी चाहिए।
अदालत की टिप्पणी
न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के ने सुनवाई के दौरान कहा कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में केवल समझौते के आधार पर कार्यवाही समाप्त करना उचित नहीं है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा:
“भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम जैसे विशेष कानून के तहत दर्ज अपराधों को केवल समझौते के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता।”
पीठ ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार समाज में गंभीर समस्या है और संवैधानिक अदालतों का कर्तव्य है कि ऐसे मामलों में सख्त दृष्टिकोण अपनाया जाए।
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अधिवक्ताओं की भूमिका पर अदालत की टिप्पणी
अदालत ने आदेश में यह भी कहा कि वकालत एक ‘नैतिक और सेवा-आधारित पेशा’ है और अधिवक्ताओं से उच्च स्तर की ईमानदारी और निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है।
अदालत ने कहा कि वकील का कर्तव्य है कि वह अपने मुवक्किल की सहायता कानून के दायरे में करे, न कि उससे अनुचित लाभ उठाए।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से यह प्रथमदृष्टया स्पष्ट होता है कि आवेदक द्वारा कथित रूप से रिश्वत की मांग से संबंधित संवाद हुआ था।
अदालत ने पाया कि:
- आवेदक “लोक सेवक” नहीं होने के कारण धारा 7 और 15 लागू नहीं होती।
- लेकिन उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 12 (उकसावे/abetment) के तहत मामला बनता है।
इस आधार पर अदालत ने FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी और कहा कि मामले में आगे की कार्यवाही जारी रहेगी।
Case Title: Sachin Chandramani Wankhede vs State of Maharashtra & Others
Case No.: Criminal Application (APL) No. 1482 of 2025
Decision Date: 10 March 2026









