कोलकाता स्थित कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में सड़क दुर्घटना में पैर गंवाने वाले एक कर्मचारी का मुआवजा बढ़ाकर 6 लाख रुपये कर दिया है। अदालत ने कहा कि केवल नौकरी बची रहना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्थायी विकलांगता से जीवन और कामकाज पर पड़ने वाले व्यापक असर को भी देखा जाना चाहिए।
यह फैसला न्यायमूर्ति बिस्वरूप चौधरी की एकल पीठ ने 24 फरवरी 2026 को सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता सुदीप रंजन डे ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के तहत दावा दायर किया था। 13 सितंबर 2009 की रात वह इस्लामपुर से लौटते समय रायगंज में राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे खड़े थे। तभी तेज रफ्तार ट्रक ने नियंत्रण खो दिया और उन्हें जोरदार टक्कर मार दी।
Read also:- सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन: 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' अध्याय वाली NCERT किताब पर पूर्ण प्रतिबंध
गंभीर रूप से घायल सुदीप को रायगंज जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों को उनका दाहिना पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा। मेडिकल बोर्ड ने उनकी स्थायी विकलांगता 85 प्रतिशत आंकी।
ट्रायल कोर्ट ने 23 मार्च 2012 को 3,55,000 रुपये मुआवजा और 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया था। बीमा कंपनी Reliance General Insurance Company Limited को भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।
लेकिन सुदीप ने कहा कि यह राशि बेहद कम है और इसमें भविष्य में कृत्रिम पैर (आर्टिफिशियल लिंब), इलाज और यात्रा खर्च को शामिल नहीं किया गया।
अपील में क्या दलीलें दी गईं
अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि अदालत ने भविष्य के चिकित्सा खर्च, कृत्रिम अंग बदलने की जरूरत और विकलांगता से होने वाली असुविधा पर ध्यान नहीं दिया।
Read also:- 40 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में दोषियों को राहत नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद बरकरार रखी
बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि सुदीप की नौकरी नहीं गई है, इसलिए आय में कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ। कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया।
अदालत की अहम टिप्पणियाँ
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि स्थायी विकलांगता और आय में कमी एक ही बात नहीं है।
पीठ ने स्पष्ट कहा, “मुआवजा केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं होता। जीवन की सुविधाओं में कमी, मानसिक पीड़ा और सामान्य कामकाज में बाधा को भी ध्यान में रखना होगा।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि “किसी कर्मचारी की नौकरी बची रहना ही पर्याप्त आधार नहीं है। कृत्रिम पैर के सहारे काम करना उसके भविष्य के प्रदर्शन और प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकता है।”
अदालत ने माना कि शरीर का हर अंग सामान्य जीवन के लिए जरूरी है। एक पैर के न होने से व्यक्ति की दिनचर्या, आत्मविश्वास और कार्यक्षमता पर असर पड़ता है।
पीठ ने यह भी कहा कि भविष्य में कृत्रिम पैर बदलने और इलाज पर खर्च होना तय है, इसलिए इन पहलुओं को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
Read also:- रूह अफजा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: यूपी में 12.5% नहीं, 4% VAT लगेगा फल पेय के रूप में
अदालत का फैसला
सभी तथ्यों और मेडिकल साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने कहा कि 3.55 लाख रुपये का मुआवजा अपर्याप्त है।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में संशोधन करते हुए कुल मुआवजा 6,00,000 रुपये तय किया। साथ ही, दावा दायर करने की तारीख से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया।
बीमा कंपनी को आठ सप्ताह के भीतर पूरी राशि रजिस्ट्रार जनरल, कलकत्ता हाईकोर्ट के समक्ष जमा करने का आदेश दिया गया। पहले से जमा की गई राशि को समायोजित करने की भी अनुमति दी गई।
इसके साथ ही अपील का निस्तारण कर दिया गया।
Case Title: Sudip Ranjan Dey vs. The Manager, Reliance General Insurance Co. Ltd. & Anr.
Case No.: F.M.A. 1318 of 2016
Decision Date: 24 February 2026










